मैं एक घर बनाऊँगा जिसमें दरवाज़े नही होंगें ! क्योंकि ?
एक दरवाज़ा होता है जिससे अनजान व्यक्ति के आने का ख़तरा बना रहता है!
एक दरवाज़ा होता है जिसकी हमें हमेशा रखवाली करनी होती है !
एक दरवाज़ा होता है जिससे समय से जाना और जिससे ससमय वापस आना होता है!
दरवाज़े पर एक जंज़ीर होती है जिसमें ताला भी लगाना परता है!
दरवाज़े पर एक छिटकिनी होती है जिसे रात में लगाना भी पड़ता है!
इसी दरवाज़े पर एक पर्दा अपनों को छुपाने के लिए भी लगाना पड़ता है!
इसी दरवाज़े पर एक दहलीज़ होती है जिसे हर कोई पार करना चाहता है!
इसी दरवाज़े पर एक चौखट होता है जो मर्यादा की सीमा को बताता है!
इसी दरवाज़े पर पाबन्दी की जंज़ीर लगी रहती है जिसे हर कोई तोड़ना चाहता है!
इसलिए जब मैं एक घर बनाऊँगा तो उसमें दरवाज़े नही होंगें!
ना दरवाज़ा होगा! ना ही ख़तरा होगा! ना रखवाली होगा! ना छिटकिनि होगा! ना ताला होगा! ना पर्दा होगा! ना दहलीज़ होगी! ना चौख़ट होगी! ना ही पाबन्दी होगी!
हर कोई खुली आँखो से सपना देख सकेगा, अपनी सच्चे सपनों के साथ खुले आकाश में पंख लगा कर उड़ सकेगा, अपनी अभिलाषा को पूरा कर सके।
लोग कहते हैं कि तुम्हारा अंदाज़ बदला बदला सा हो गया है पर कितने ज़ख्म खाए हैं इस दिल पर तब ये अंदाज़ आया है..! A6
Tuesday, 8 March 2016
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर "मन की बात"
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“ऐसा क्या लिखू की तेरे दिल को तस्सली हो जाये,
क्या इतना कहना काफीं नहीं है कि मेरी जिंदगी हो तुम..!!”
Thursday, 3 March 2016
धर्मप्रेमिका !
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“ऐसा क्या लिखू की तेरे दिल को तस्सली हो जाये,
क्या इतना कहना काफीं नहीं है कि मेरी जिंदगी हो तुम..!!”
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