Saturday, 1 August 2015

महिला सशक्तीकरण

1.
एक कवि नदी किनारे खड़ा था
तभी वहा से एक लड़की
का शव तैरता जा रहा था..
तो कवी ने उस शव से पूछा.....
कौन हो तुम ओ सुकुमारी.
बह रही हो नदी के जल में
कोई तो होगा तेरा अपना.
मानव निर्मित इस भू तल मे |
किस घर की तुम बेटी हो.
किस क्यारी की तुम कली हो |
किसने तुमको छला ह् बोलो.
क्यो दुनियां छोड़ चली हो |
किसके नाम मेंहदी हाथो रची ह तेरे.
किसके नाम की बिंदियां माथे सजी हे तेरे |
लगती हो तुम राजकुमारी .
या देव लोक से आई हो. |
उपमा रहित ये रूप तुम्हारा.
ये रूप कहा से लाई हो |
कवि की बात सुनकर लड़की की आत्मा
बोलती हे.

कवि राज मुझे क्षमा करो.
गरीब पिता की बेटी हूं |
इसलिये म्रत मीन की भांति.
जल धारा पे लेटी हूं |
रूप रंग और सुंदरता ही.
मेरी पहचान बताते हे |
कंगन चूड़ी मेंहदी बिंदिया.
सुहागन मुझे बनाते हे |
पिता के दुख को दुखी समझा.
पिता के दुख मे दुखी थी मैं |
जीवन के इस पथ पर.
पति के संग चली थी मे |
पति को मेने दीपक समझा.
और उसकी लौ मे जली थी मे |
माता पिता का आंगन छोड़कर.
उसके रंग मे रंगी थी मे |
पर वो निकला सौदागर.
लगा दिया मेरा भी मोल |
धन दौलत और दहेज की खातिर.
जल मे पिला दिया विष घोल |
दुनियां रूपी इस उपवन मे.
छोटी सी कली थी मे |
जिसको समझा था माली.
उसी के द्वारा छली थी मे |
ईश्वर से अब न्याय मांगने.
शव शैय्या पर पड़ी हू मे |
दहेज के लोभी इस संसार मे
दहेज की भैंट चढ़ी हूं मे...
दहेज की भैंट चढ़ी हूं मै...

2.
घर की शान मान सम्मान कन्यादान में दे दी
ए दहेज़ के लोभियों अब और क्या लोगे,

माँ ने अपनी प्यारी गुड़ियाँ कन्यादान में दे दी
ए दहेज़ के लोभियों अब और क्या लोगे,

पिता ने शिक्षा, संस्कार, सभ्यता कन्यादान में दे दी
ए दहेज़ के लोभियों अब और क्या लोगे,

भाई ने रक्षा बंधन की शान कन्यादान में दे दी
ए दहेज़ के लोभियों अब और क्या लोगे,

सखी ने बचपन की सहेली कन्यादान में दे दी
ए दहेज़ के लोभियों अब और क्या लोगे,

रिश्तेदारों ने मिलकर दुआएं बधाई कन्यादान में दे दी
ए दहेज़ के लोभियों अब और क्या लोग

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