दूर तलक तक झाँक के देखो,हर घडी सुहागन लगती है।
सिन्दूर छुपी उस माँग को देखो,हर कड़ी अभागन लगती है।
किस मजहब की बाते करते,कैसी है ये निर्मोह लहर,
सच्चे मन से देखो तो,वेश्या भी पावन लगती है।
गर श्वेत,हरा या केसरिया,तुमको ना भाते तो सोचो,
गलत नहीं फिर देखो तो,सीता भी रावन लगती है।
किस मजहब पे मरते इंसा,ये कौम हुकूमत बंद करो,
जरा गौर से देखो तो,बिटिया भी मनभावन लगती है।
गर नहीं मिलाना कन्धा हमसे,तो कन्धे ना टकराओ यूं,
जरा मिलाओ दूध तो देखो,दही भी जामन लगती है।
गर आंसू ना पोंछ सको तो,खूँ बहाना नाजायज,
इक बार जरा करके देखो तो,मोहब्बत भी सावन लगती है।
हो आजादी तुम्हे मुबारक,पर इतना ध्यान रहे .......,
संगदिली हमेशा साथ रहे तो,हिजरत भी आँगन लगती है।
लोग कहते हैं कि तुम्हारा अंदाज़ बदला बदला सा हो गया है पर कितने नज़र अंदाज़ हुए हैं तब ये अंदाज़ आया है..!
Sunday, 8 November 2015
हर घड़ी सुहागन लगती है
राधे और कृष्ण : क्यों नहीं बंधे विवाह बंधन में? : भाग – 1
जब कृष्ण के प्रति राधा का प्रेम समाज को चुभने लगा तो घर से उनके निकलने पर रोक लगा दी गई। लेकिन कृष्ण की बंसी की धुन सुनकर राधा खुद को रोक नहीं पाती थी। यह देखकर उनके घरवालों ने उन्हें खाट से बांध दिया था। फिर क्या हुआ आगे ? पढ़िए और जानिए-
पूर्णिमा की शाम थी। राधे को बांसुरी की मधुर आवाज सुनाई दी। उन्हें लगने लगा कि अपने शरीर को छोडक़र बस वहां चली जाएं। कृष्ण को राधे की इच्छा और उस पीड़ा का अहसास हुआ, जिससे वह गुजर रही थीं। वह उद्धव और बलराम के साथ राधे के घर गए और उसकी छत पर जा चढ़े।
उन्होंने राधे के कमरे की खपरैल को हटाया, धीरे-धीरे नीचे उतरे और राधे को आजाद कर दिया। इतने में ही बलराम भी छत से नीचे आ गए। उन्होंने कृष्ण और राधे दोनों को उठाया और बाहर आ गए। इसके बाद सभी ने पूरी रात खूब नृत्य किया। अगली सुबह जब मां ने देखा तो राधे अपने बिस्तर पर सो रही थीं।
पूर्णिमा का यह अंतिम रास था। कृष्ण ने माता यशोदा से कहा कि वह राधे से विवाह करना चाहते हैं। इस पर मां ने कहा, ‘राधे तुम्हारे लिए ठीक लडक़ी नहीं है; इसकी वजह है कि एक तो वह तुमसे पांच साल बड़ी है, दूसरा उसकी मंगनी पहले से ही किसी और से हो चुकी है। जिसके साथ उसकी मंगनी हुई है, वह कंस की सेना में है। अभी वह युद्ध लडऩे गया है। वह जब लौटेगा तो अपनी मंगेतर से विवाह कर लेगा। इसलिए तुम्हारा उससे विवाह नहीं हो सकता। वैसे भी जैसी बहू की कल्पना मैंने की है, वह वैसी नहीं है। इसके अलावा, वह कुलीन घराने से भी नहीं है। वह एक साधारण ग्वालन है और तुम मुखिया के बेटे हो। हम तुम्हारे लिए अच्छी दुल्हन ढूंढेंगे।’ यह सुनकर कृष्ण ने कहा, ‘वह मेरे लिए सही है या नहीं, यह मैं नहीं जानता। मैं तो बस इतना जानता हूं कि जब से उसने मुझे देखा है, उसने मुझसे प्रेम किया है और वह मेरे भीतर ही वास करती है। मैं उसी से शादी करना चाहता हूं।’
मां और बेटे के बीच यह वाद-विवाद बढ़ता गया। माता यशोदा के पास जब कहने को कुछ न रहा तो बात पिता तक जा पहुंची। माता ने कहा, ‘देखिए आपका बेटा उस राधे से विवाह करना चाहता है। वह लडक़ी ठीक नहीं है। वह इतनी निर्लज्ज है कि पूरे गांव में नाचती फिरती है।’ उस वक्त के समाज के बारे में आप अंदाजा लगा ही सकते हैं। कृष्ण के पिता नंद बड़े नरम दिल के थे, अपने पुत्र से बेहद प्रेम करते थे। उन्होंने कृष्ण से इस बारे में बात की, लेकिन कृष्ण ने उनसे भी अपनी बात मनवाने की जिद की। ऐसे में नंद को लगा कि अब कृष्ण को गुरु के पास ले जाना चाहिए। वही उसे समझाएंगे।
गर्गाचार्य और उनके शिष्य संदीपनी कृष्ण के गुरु थे। गुरु ने कृष्ण को समझाया, ‘तुम्हारे जीवन का उद्देश्य अलग है। इस बात की भविष्यवाणी हो चुकी है कि तुम मुक्तिदाता हो। इस संसार में तुम ही धर्म के रक्षक हो। तुम्हें इस ग्वालन से विवाह नहीं करना है। तुम्हारा एक खास लक्ष्य है।’ कृष्ण बोले, ‘यह कैसा लक्ष्य है, गुरुदेव? अगर आप चाहते हैं कि मैं धर्म की स्थापना करूं, तो क्या इस अभियान की शुरुआत मैं इस अधर्म के साथ करूं? आप समाज में धार्मिकता और साधुता स्थापित करने की बात कर रहे हैं। क्या यह सही है कि इस अभियान की शुरुआत एक गलत काम से की जाए?’ गुरु गर्गाचार्य ने कहा, ‘धर्मविरुद्ध काम करने के लिए तुमसे किसने कहा?’
कृष्ण ने कहा, ‘आठ साल पहले जब मुझे ओखली से बांध दिया गया था, तो यह लडक़ी मेरे पास आई थी। तभी उसकी नजर मुझ पर पड़ी।
उस पल से मैं ही उसके जीवन का आधार बन चुका हूं। उसका दिल, उसके शरीर की हर कोशिका मेरे लिए ही धडक़ती है। एक पल के लिए भी वह मेरे बिना नहीं रही है। अगर एक दिन मुझे न देखे तो वह मृतक के समान हो जाती है। वह पूरी तरह मेरे भीतर निवास करती है और मैं उसके भीतर। ऐसे में अगर मैं उससे दूर चला गया, तो वह निश्चित ही मर जाएगी। मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब सांपों वाली घटना हुई, अगर मैं वहीं मर जाता तो गांव में दुख तो बहुत से लोगों को होता, लेकिन राधे वहीं अपने प्राण त्याग देती।’
देखो, हर कोई सोचता है कि कृष्ण अजेय हैं, वह मर नहीं सकते, लेकिन खुद कृष्ण अपनी नश्वरता के प्रति पूरी तरह सजग थे।
गर्गाचार्य ने कहा, ‘तुम्हें नहीं लगता, तुम पूरी घटना को कुछ ज्यादा ही बढ़ा चढ़ाकर बता रहे हो?’ कृष्ण ने कहा, ‘नहीं, मैं बढ़ा चढ़ाकर नहीं बता रहा हूं। यही सच है।’ गर्गाचार्य ने दोबारा कहा, ‘तुम मुक्तिदाता हो, तुम्हें धर्म की स्थापना करनी है।’ कृष्ण बोले, ‘मैं मुक्तिदाता नहीं बनना चाहता। मुझे तो बस अपनी गायों से, बछड़ों से, यहां के लोगों से, अपने दोस्तों से, इन पर्वतों से, इन पेड़ों से प्रेम है और मैं इन्हीं के बीच रहना चाहता हूं।’
खूबसूरती !
हर किसी को अपनी खूबसूरती पर घमण्ड होता है!
मै आज आपको खूबसूरती की परिभाषा बताता हूँ!!
खूबसूरत है वो लब!
जिन पर, दूसरों के लिए कोई दुआ आ जाए !!
खूबसूरत है वो दिल!
जो, किसी के दुख मे शामिल हो जाए !! .
खूबसूरत है वो जज़बात!
जो, दूसरो की भावनाओं को समज जाए !! .
खूबसूरत है वो एहसास!
जिस मे, प्यार की मिठास हो जाए !! .
खूबसूरत है वो बातें!
जिनमे, शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से कहानियाँ !!
खूबसूरत है वो आँखे!
जिनमे, किसी के खूबसूरत ख्वाब समा जाए !!
खूबसूरत है वो हाथ!
जो किसी के, लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए !!
खूबसूरत है वो सोच!
जिस मैं, किसी कि सारी ख़ुशी झुप जाए!! .
खूबसूरत है वो दामन!
जो, दुनिया से किसी के गमो को छुपा जाए !!
खूबसूरत है वो आंसू!
जो, किसी और के गम मे बह जाए…!!
संतानहीनता: अभिशाप नहीं वरदान है
प्रश्नकर्ता: एक स्त्री होते हुए बच्चे के बिना मैं अधूरा महसूस करती हूं। क्या मैंने कुछ गलत किया है कि मुझे मां बनने का सौभाग्य नहीं मिला?
उत्तर:-
यह सोच ही गलत है कि मां बनने के बाद आपका जीवन परिपूर्ण होगा। आपको बस आपके हारमोन संबंधी स्रावों ने धोखा दिया है। आप अपनी बुद्धि से काम नहीं ले रही हैं। अगर संतान पैदा करने से संतुष्टि होती, तो अब तक दुनिया परिपूर्ण हो गई होती? बहुत से लोगों ने दर्जन भर बच्चे पैदा कर लिए हैं। क्या वे किसी तरह से पूर्ण हैं? बिल्कुल नहीं।
बच्चे को जन्म दिए बिना एक स्त्री का जीवन अधूरा होता है, यह समाज की बनाई हुई एक बहुत पक्षपातपूर्ण धारणा है।
बच्चे बिना जीवन अधूरा नहीं
तो क्या इसका यह मतलब है कि किसी को बच्चे नहीं पैदा करने चाहिए? बात यह नहीं है। जब आप स्वाभाविक रूप से एक बच्चे को जन्म देते हैं, तो उसमें कोई हर्ज नहीं है। लेकिन अगर आप बच्चे को जन्म देने में असमर्थ हैं, तो अपने आप को अनावश्यक रूप से दुखी न करें। बच्चे को जन्म दिए बिना एक स्त्री का जीवन अधूरा होता है, यह समाज की बनाई हुई एक बहुत पक्षपातपूर्ण धारणा है। भारत में एक समय ऐसा भी था जब एक संतानहीन स्त्री को हर किसी के लिए अपशकुनी माना जाता था। अगर कोई सिर्फ संतान पैदा न कर पाने पर अपशकुनी होता है, तो जो लोग अध्यात्म की राह पर चले और ऐसी चीजों के बारे में कभी परवाह ही नहीं की, क्या वे सभी अपशकुनी थे? सारे साधु-संन्यासी, विवेकानन्द, ईसामसीह ऐसे ही लोग थे। इनकी तो आज पूजा की जाती है।
आप असल में बच्चा क्यों चाहते हैं?
इसलिए क्योंकि कुछ समय बाद, आपके जीवनसाथी के साथ आपका जुड़ाव उतना नहीं रह जाता और आप उस जुड़ाव की कमी महसूस करने लगते हैं। इसलिए आप खेलने के लिए एक नया खिलौना चाहते हैं और आपको लगता है कि बच्चा अच्छा रहेगा। आपको अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए बच्चे को पैदा नहीं करना चाहिए, यह एक बच्चे को दुनिया में लाने का अच्छा तरीका नहीं है। बदकिस्मती से 99 फीसदी बच्चे दुनिया में इसी तरह आते हैं। बच्चे पैदा करने पर आप पूर्ण नहीं होंगे। आप असल में एक दूसरे जीवन के साथ जुड़ने की एक गहरी भावना का अनुभव करना चाहते हैं। जरूरी नहीं है कि यह जुड़ाव जैविक संबंध से प्रेरित हो। इसे आपकी जागरूकता और समझ से भी सामने लाया जा सकता है।
बहुत से बच्चे हैं, जिन्हें पालने की जरूरत है
मान लीजिए एक स्त्री किसी बच्चे को जन्म देती है, ठीक उसी समय उसके बच्चे को किसी और के बच्चे से बदल दिया जाए, तब भी वह वैसा ही अनुभव करेगी, जैसा वह अपने बच्चे के साथ करती। अपनेपन का आधार आपका अपना खून नहीं है। मनुष्य जो अपनापन महसूस करता है, वह भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक नजदीकी के कारण होता है। इसलिए इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह बच्चा आपसे पैदा हुआ है या किसी और से? आप उस बच्चे को कितनी गहराई से स्वीकार करते हैं और अपना हिस्सा मानते हैं, इस पर वह अनुभव निर्भर करता है। यह मनोविज्ञान है, जीवविज्ञान नहीं। इसलिए बच्चा न होने को इतना बड़ा मुद्दा न बनाएं और समाज के दबावों के आगे सिर न झुकाएं। अगर आप वाकई एक बच्चे को पालना चाहती हैं, तो ऐसे बहुत से बच्चे हैं, जिन्हें पालने की जरूरत है। इस मामले में कुछ करना चाहिए। मैं तो कहूंगा कि अगर कोई दंपति बच्चा पैदा करने में सक्षम भी है, तो भी उन्हें कोई बच्चा गोद लेना चाहिए क्योंकि इससे मनोवैज्ञानिक क्षितिज का खूब विस्तार होगा।
इसलिए इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह बच्चा आपसे पैदा हुआ है या किसी और से? आप उस बच्चे को कितनी गहराई से स्वीकार करते हैं और अपना हिस्सा मानते हैं, इस पर वह अनुभव निर्भर करता है। यह मनोविज्ञान है, जीवविज्ञान नहीं।
नि:संतान महिलाएं -पृथ्वी के लिए वरदान
फिलहाल, मानव जाति के विलुप्त होने का कोई खतरा नहीं है। असल में, जनसंख्या का विस्फोट हो रहा है। आज सभी नि:संतान दंपतियों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए क्योंकि हमने इस देश में ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जहां मानव जन्म एक अभिशाप हो गया है। जो देश के लिए अभिशाप है, वह हर किसी के लिए अभिशाप है। दुनिया की जनसंख्या सात अरब पार कर रही है, जिसमें आधी मानव जाति भयावह स्थितियों में जी रही है – लाखों बच्चे आवश्यरक भोजन और कपड़ों के बिना मर रहे हैं। जब ऐसी स्थिति है, तो नि:संतान महिलाएं इस पृथ्वी के लिए वरदान हैं। वे बहुत बड़ा योगदान कर रही हैं। यह बात असंवेदनशील और गैरजिम्मेदाराना लग सकती है, लेकिन मैं आपको समझाना चाहता हूं कि किसी बच्चे के लिए अच्छे से जीने की जरूरी संभावनाएं पैदा किए बिना इस दुनिया में बच्चे को लाना सबसे असंवेदनशील और गैरजिम्मेदाराना काम है।
प्यार कुछ भी नही है बस तेरी मेरी कहानी है !
सुबह उठ कर आँखे खोलने से पहले जिसका चेहरा देखने की इच्छा हो,वो प्यार है…
मंदिर में दर्शन करते किसी के पास खड़े होने का एहसास हो ,वो प्यार है..
पुरे दिन की थकान जिसके साथ बैठने की कल्पना से ही दूर हो जाए, वो प्यार है…
सर किसी की गोद में रखकर लगे की मन हल्का हो गया,वो प्यार है...
लाख कोशिश करके दिल जिससे नफरत ना कर सके और ना ही भूल सके,वो प्यार है...
इसे पढ़ते वक़्त जिस किसी की भी याद आये, वो प्यार है ....
Thursday, 29 October 2015
करवा चौथ और पत्नी की क़िस्मत
पिता हर हाल में अपने बेटिया को खुश देखना चाहते हैं।इसी आश मे एक समय के बाद उसके लिए एक राजकुमार को खरीदते हैं जिसे हम दहैज़ कहते हैं।
पिता का संवाद बेटी से :-
पिता राजकुमारी जैसी बेटिया से कहतें हैं। देखो बेटिया तुम्हारे लिए राजकुमार खरीद कर लायें हैं जो तुम्हें बहुत प्यार देगा, मान-सम्मान देगा, तुम्हारी हर पल ख़्याल रखेगा, तुम्हारी हर बात मानेगा, हम से ज्यादा तुम्हारी हर बात सुनेगा इस लिये सबसे मँहगा राजकुमार बाज़ार से ख़रीद कर लाया हूँ।।
बेटी का पिता से संवाद:-
सच में अगर वे मुझसे प्यार करेगा तो वह बाज़ार में नही बिकता और आप उसे ख़रीद कर नही लाते। अगर शादी के बाद भी वह मुझसे सच्चा प्यार करेगा तो वह मेरे पिता के बिका हुआ ज़मीन और माँ का बिका गहना वापस करवा दिया होता......
लड़की बाज़ार में बिक जाये तो पूरा समाज उस पर और उसके परिवार पर थूकता है।
वँहीं
लड़का बाज़ार में जितनी ऊँची क़ीमत(दहैज़) में बिक जाये तो पूरा समाज उसे सम्मान और आदर से देखता है.....
कोई हमे भी बताये यह क्या हो रहा है ?
अरे, समाज के ठेकेदारों कब तक यह खेल खेलते रहोगो....
"कभी बेटा को बेचते हो..!
कभी बेटी के लिये ख़रीदते हो..!"
इसे ही आधुनिक समाज का मीणा बाज़ार कहते हैं !
जितनी ऊँची ख़रीद-बिक्री हो उतना बड़ा परिवार, उतना बड़े इज़्ज़त वाला ।
आप सभी का इस क्रेता और विक्रेता व्यपार मेला में स्वागत है ।।
करवा चौथ आने वाला है दहैज़ लोभी का दम भर आरती उतारा जाए और बोला जाये की तुम ही 7 जन्मों तक मिलो और शादी के पहले इसी तरह हर जन्म में दहैज़ लेते रहो। इस लिये हम आपकी लम्बी आयु की कामना करती हूँ। और पति कहता है मैं तुम से सातो जन्म इसी तरह प्यार करता रहूँगा। जिस जन्म में दहैज़ नही या कम मिलेगा 7 जन्म का कॉन्टेक्ट उसी वक्त ख़त्म......
हमारे समाज के आधे से अधिक महिला इस लिये करवा चौथ करती है क्योंकि उसकी पड़ोसी भी करती है। अगर यह व्रत न करे न जाने कितने और किस प्रकार के आरोप उस पर लगेगा, शायद इस लिये भी करती है।असली बात यही है हमारे समाज में औरत की ज़िंदगी का नक्शा उसके पति से तय होता रहा है इस लिये यह व्रत करती है......
यह बात मुझे समझ में नही आती है कोई दिन भर भूखे प्यासे रहे और उम्र सामने वाले का बढ़ जाए।फिर भी उम्र सिर्फ़ पति की ही क्यों बढ़ाई जाए, पत्नी की क्यों नहीं ? अगर पति की उम्र बढ़ती जाए और पत्नी की न बढ़े तो क्या यह अंततः पति के विधुर हो जाने की गारंटी नहीं है ?
कितना अच्छा होता कि इस व्रत का रूप कुछ और बदले। या तो पत्नियों के साथ पति भी व्रत रखें या दोनों ही इन प्रतीकों से मुक्त रहने का निर्णय करके इस दिन साथ-साथ घूमने-फिरने जाएँ, या फिर पति बोले मैं तो बस इतना चाहता हूँ कि मेरे लिये भूखे प्यासे रहने की कोई ज़रूरत नही है, मेरी लम्बी उम्र से भी ज़रूरी तुम्हारा स्वास्थ्य है मेरे लिए, रही बात सात जन्म साथ साथ जीने की तो मैं इसी जन्म में सात जन्म ऐसा जीना चाहता हूँ तुम्हारे साथ.....
पत्नी द्वारा पति के पैर छूने की भद्दी, सामंती तथा अलोकतांत्रिक परंपरा खत्म हो। पति की पूजा करने वाली पुजारिन की जगह उसे पति का दोस्त बनने का मौका मिले, बराबरी की ज़िंदगी मिले।
अंत में बस इतना कहूँगा ...
प्यार तो सब करता है पर अधिकार की बात कोई नही करता है..!!
शादी तो सब करता है पर बराबर का अधिकार कोई नही देता है..!!
Thursday, 22 October 2015
"किसी को स्तन से तकलीफ़, किसी को टाँग से" :-एनी ज़ैदी
महाराष्ट्र में डांस बार के फिर से खुलने की संभावना हैं. सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि बार (यानी शराबघर) में डांस पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती है.
कोर्ट ने माना है कि डांसरों को बार में काम करने का हक़ है, लेकिन साथ में ये चेतावनी भी दी है कि डांस में किसी प्रकार की अश्लीलता ना हो.
लेकिन ‘अश्लीलता’ क्या है? इसकी क़ानून में कोई परिभाषा तय नहीं है. जैसे ‘लाज’ या ‘इज़्ज़त’ या ‘सुशीलता’ की कोई क़ानूनी परिभाषा नहीं. किसी को मटकना अश्लील लगता है तो किसी को आँख का इशारा.
किसी को स्तन से तकलीफ़ है तो किसी को टाँग से. किसी को लड़कियों का जींस पहनना अश्लील लगता है और किसी को लड़कों का चूमना.
संस्कृति और अश्लीलता की लाठी का सहारा लेकर न जाने कितनी बार औरतों पर हमला हुआ है.
कुछ लोग, जिन्हें ना जनता ने वोट दिया है और ना ही किसी ने हिन्दुस्तानी संस्कृति का ठेका उनके हवाले किया है, पिछले कुछ सालों से मंगलुरु जैसे शहरों में क्लब और बार में लड़कियों को ढूँढ़-ढूँढ़कर मारते हैं.
कुछ पुलिस वाले सारे क़ानूनों को तोड़ते हुए मीडिया समेत मेरठ के पार्क में पहुँच जाते हैं और युवक-युवतियों को 'अश्लीलता' फैलाने के नाम पर मारा-पीटा जाता है.
अब महाराष्ट्र सरकार ये कहती है कि औरतों का बार में नाचना संस्कृति के ख़िलाफ़ है. जबकि सब जानते हैं कि हमारी संस्कृति में औरतों का नाचना तो शामिल है ही साथ ही साथ शराब, भांग और चरस भी शामिल है.
हिन्दुस्तान में हज़ारों तरह की संस्कृतियाँ एक साथ जीवित हैं.
यहाँ मंदिरों में संभोग के दृश्य तराशे गए. इसी देश में लड़कियाँ सार्वजनिक नाच में भाग लेती हैं, ख़ुद भी शराब पीती हैं और अपने पसंद का साथी चुनती हैं.
भारत के अंडमान द्वीप पर कुछ लोग निर्वस्त्र भी रहते हैं और ख़ुद को अश्लील नहीं समझते.
एक समय था जब देश के कई हिस्सों में औरतें ब्लाउज़ नहीं पहनती थीं. बल्कि पिछली सदी में कुछ औरतों ने अपनी स्मृति रचनाओं में लिखा भी है कि नानी के ज़माने में कोई युवती ब्लाउज़ पहन ले तो उसको अश्लील कह के डाँटा जाता था! छुप-छुप के ब्लाउज़ पहनती थी, रात को, सिर्फ़ पति को दिखाने के लिए!
सदियों से नाच-गाने का प्रदर्शन हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है. कभी मंदिर में हुआ करता था फिर महल-हवेली में हुआ. उसके बाद कोठे में इसे मर्यादा-बद्ध किया गया. फिर ये सभागृह में और सिनेमा के पर्दे पर आया.
क्या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री साहब ये सब नहीं जानते? क्या संगीत बरी और लावनी संस्कृति का हिस्सा नहीं है?
जब दरबार या बैठक में नाच होता था, तो क्या दर्शक शराब नहीं पीते थे? आज भी गाँव के मेले में हज़ारों मर्दों के सामने औरतें नाचती-गाती हैं. घर-घर में टीवी पर डांस देखा जाता है.
उसी तरह का डांस बार में हो, तो नेता संस्कृति और अश्लीलता की दुहाई देने लगते हैं.
शायद सुप्रीम कोर्ट को फ़िक्र इस बात की है कि बार में डांस के बहाने औरत का शोषण ना हो. ये फ़िक्र इंसानी तौर पर ठीक है, लेकिन इसका क्या फ़ायदा जब तक ‘शोषण’ और ‘अश्लीलता’ की कोई क़ानूनी परिभाषा ना बनाई जाए?
मसला डांस का नहीं है. मसला ये है कि डांस ख़त्म होने के बाद, बार बंद हो जाने के बाद क्या होता है.
बार में डांसर को छूना मना है, ये तो पहले भी नियम था. अगर उस पर दबाव डाला जाता है कि किसी ग्राहक के साथ, या स्वयं बार के मालिक के साथ, संबंध बनाए या अपने जिस्म का सौदा करे, तो उस डांसर को यक़ीन होना चाहिए कि वो पुलिस के पास जा सकती है.
साथ ही बार में डांस करने वालों का संगठन मज़बूत होना चाहिए, ताकि अगर कोई बार मालिक क़ानून तोड़ रहा है तो उसके ख़िलाफ़ बुलंद आवाज़ उठा सकें.
उसे दुत्कारा-फटकारा नहीं जाएगा, इस भरोसे के साथ कोई बार डांसर पुलिस के पास जाए तो क्या उसके साथ ऐसा बर्ताव होगा कि जैसे किसी पुलिस वाले की बेटी थाने में आई हो यह शिकायत दर्ज कराने के लिए कि उसके दफ़्तर में उस पर जिस्म का सौदा करने का दबाव डाला जा रहा है? क्या ये हो पाएगा?
इसका जवाब मेरे पास नहीं है. जवाब सिर्फ़ पुलिस दे सकती है और सरकार चलाने वाले नेता.
लेकिन जब तक वे अपना दिल टटोल कर जवाब ढूँढते हैं, हमारे वकीलों और न्यायधीशों को भी अपना दिल टटोलना होगा और इस शब्द की परिभाषा सोचनी होगी.
‘अश्लीलता’ क्या है, इसकी परिभाषा क़ानूनी रूप से स्पष्ट हो और इस शब्द की आड़ में देश की जनता पर हमला करने वालों को कड़ी सज़ा दी जाए.
Thursday, 8 October 2015
चोर से मेरी मुलाक़ात
कुछ दिन पहले की बात है एक लड़का मुझ से मिला और मेरे साथ दुकान पर गया । उसे कुछ सामान लेना था, दुकानदार उसको सामान देनें लगा और उसी बीच यह लड़का कुछ सामान चोरी कर लेता है इस बात की भनक मुझे भी नही लगी। दुकान से बाहर निकलने के कुछ दूर बाद मैनें देखा जो सामान खरीदा भी नही है वह भी उसके पास था ..मामला पूरी तरह समझनें में देर नही लगी।
इस से पहले कि मैं कुछ पूछता वह बोल परा ...
यह सब होते रहता है.....
इसी को कहते हैं अनुभव ....
अगर तुम तेज़ होते तो सामान उठा कर दिखाते...
हम होशियार थे तब ना उसके सामने रहते यह सब कम किये ना की पीठ-पीछे...
हिम्मत इसको कहते हैं दिखाना..
कमज़ोर आदमी की बस की बात नही है...
इस तरह का काम करना मेरा शौक है....
उसका सामान लिए हैं तुम्हारा क्या है...
जिसका लिए हैं वह बहुत बड़ा बेईमान है...
समझा की नही समझा...
यह सब सुन कर मेरा मन अशांत हो गया है उसके एक भी सवाल का जवाब नही दे पाया....
क्या इसी को कहते हैं तेज होना ?
क्या यही होशियार की पहचान है ?
क्या हिम्मत दिखाने का सही अर्थ यही होता है ?
"चोरी की ईंट से बनाया गया मकान
कभी भी ईमानदारी का छाँव नही देता"
इस बात को उसको कैसे बतायें ?
ईमानदरी ही सर्वोपरि गुण होता है। यह बाज़ार में नही मिलती है जो जरूरत पड़ने पर कोई ख़रीद ले।
..
अब यक्ष प्रश्न यह है कि इस हालत में मैं क्या करूँ ?
Wednesday, 7 October 2015
पगली
ऊपर वाले तेरी दुनिया कितनी अजब निराली है
कोई समेट नहीं पाता है किसी का दामन खाली है
एक कहानी तुम्हें सुनाऊँ एक किस्मत की हेठी का
न ये किस्सा धन दौलत का न ये किस्सा रोटी का
साधारण से घर में जन्मी लाड़ प्यार में पली बढ़ी थी
अभी अभी दहलीज पे आ के यौवन की वो खड़ी हुई थी
वो कालेज में पढने जाती थी कुछ-कुछ सकुचाई सी
कुछ इठलाती कुछ बल खाती और कुछ-कुछ शरमाई सी
प्रेम जाल में फँस के एक दिन वो लड़की पामाल हो गई
लूट लिया सब कुछ प्रेमी ने आखिर में कंगाल हो गई
पहले प्रेमी ने ठुकराया फिर घर वाले भी रूठ गए
वो लड़की पागल-सी हो गई सारे रिश्ते टूट गए
अभी-अभी वो पागल लड़की नए शहर में आई है
उसका साथी कोई नहीं है बस केवल परछाई है
उलझ- उलझे बाल हैं उसके सूरत अजब निराली-सी
पर दिखने में लगती है बिलकुल भोली-भाली-सी
झाडू लिए हाथ में अपने सड़कें रोज बुहारा करती
हर आने जाने वाले को हँसते हुए निहारा करती
कभी ज़ोर से रोने लगती कभी गीत वो गाती है
कभी ज़ोर से हँसने लगती और कभी चिल्लाती है
कपड़े फटे हुए हैं उसके जिनसे यौवन झाँक रहा है
केवल एक साड़ी का टुकड़ा खुले बदन को ढाँक रहा है
भूख की मारी वो बेचारी एक होटल पर खड़ी हुई है
आखिर कोई तो कुछ देगा इसी बात पे अड़ी हुई है
गली-मोहल्ले में वो भटकी चौखट-चौखट पर चिल्लाई
लेकिन उसके मन की पीड़ा कहीं किसी को रास न आई
उसको रोटी नहीं मिली है कूड़ेदान में खोज रही है
कैसे उसकी भूख मिटेगी मेरी कलम भी सोच रही है
दिल कहता है कल पूछूंगा किस माँ-बाप की बेटी है
जाने कब से सोई नहीं है जाने कब से भूखी है
ज़ुर्म बताओ पहले उसका जिसकी सज़ा वो झेल रही है
गर्मी-सर्दी और बारिश में तूफानों से खेल रही है
शहर के बाहर पेड़ के नीचे उसका रैन बसेरा है
वहीँ रात कटती है उसकी होता वहीँ सवेरा है
रात गए उसकी चीखों ने सन्नाटे को तोडा है
जाने कब तक कुछ गुंडों ने उसका जिस्म निचोड़ा है
पुलिस तलाश रही है उनको जिनने ये कुकर्म किया है
आज चिकित्सालय में उसने एक बच्चे को जन्म दिया है
कहते हैं तू कण-कण में है तुझको तो सब कुछ दिखता है
हे ईश्वर क्या तू नारी की ऐसी भी क़िस्मत लिखता है
उस पगली की क़िस्मत तूने ये कैसी लिख डाली है
गोद भर गई है उसकी पर मांग अभी तक खाली है --