मैंने आख़री बार कब बहन को फ़ोन मिलाया था कुछ धुन्दला सा याद है
मैंने आख़री बार कब उसे खूब हँसाया था, कुछ धुन्दला सा याद है
सुबह स्कूल जाने से पहले मेरा नाश्ता त्यार रहता था
मैंने आखरी बार कब पहला निवाला उसके मुँह में डाला था, कुछ धुन्दला सा याद है
वो मेरे स्कूल की छुटियों का काम कर दिया करती थी
मैंने आख़री बार कब शुक्रिया अदा जताया था, कुछ धुन्दला सा याद है
गर्मियों के वो दिन जब मैं खेल के घर लौटता था और वो शरबत बना दिया करती थी
मैंने आखरी बार कब उसकी तारीफ करके सरहाया था, कुछ धुन्दला सा याद है
मेरी हर ज़िद्द के लिए उसने अपनी गुल्क तोड़ी है
मैं कब बिना किसी वजा के उसके लिए तोहफा लाया था, कुछ धुन्दला सा याद है
वो मुझे बाप की गालियों और मार से बचाया करती थी
मैंने कब उसकी ख्वाइशों पे असर आज़माया था, कुछ धुन्दला सा याद है
वो मेरी बड़ी फ़िक्र किया करती थी नाजाने मैं क्यों ना समझा
मेरे अंदर दबा उसके लिए बेहद प्यार का एहसास कब दिलाया था, कुछ धुन्दला सा याद है
वो जब भी आती है मैं अब उसे दीदी या बहन कहकर पुकारता हूँ
मैंने आखरी बार कब उसे चुड़ैल या भूतनी कह कर चिढ़ाया था, कुछ धुन्दला सा याद है
डोली की विदाई वक़्त सारे रो रहे थे इसलिए मैं भी रो पड़ा
मैंने ये झूठ क्यों फ़रमाया था, कुछ धुन्दला सा याद है
अब ये आलम है के मैं उसी घर में रहता हूँ और वो कभी कभी आया करती है
तेरी बहुत याद आती है कहकर कब सीने से लगाया था, कुछ धुन्दला सा याद है ~
लोग कहते हैं कि तुम्हारा अंदाज़ बदला बदला सा हो गया है पर कितने नज़र अंदाज़ हुए हैं तब ये अंदाज़ आया है..!
Tuesday, 26 April 2016
सभी बहनों को समर्पित
Thursday, 7 April 2016
Friday, 1 April 2016
-:: सीतवा::-
सन् 1998 की बात है.. रखवा बस्ती का शुकर मांझी अपने दो-तीन साथियों के साथ एकदम भोरे-भोरे जब अँधेरा छँटा नहीं था तब बकरी के लिए पाल्हा (चारा) लाने के लिए जंगल की ओर निकला । जंगल के बोरवा गढ़ा के निकट पहुँचे ही थे कि एक नवजात बच्ची की रोने की आवाज़ सुनाई दी… रोने की आवाज़ बहुत जोर-जोर से आ रही थी… इतनी सुबह और यहाँ इस जंगल के बीचों-बीच बोरवा गढ़ा में जहाँ पे भूतों का निवास माना जाता है, वहाँ से बच्चे की रोने की आवाज़ ? शुकर मांझी के साथी सब डर गए… बोले ,” शुकर दा.. कुछ गड़बड़ सड़बड़ लग रहा है यहाँ … चलिए जल्दी से निकलते है इधर से .. अँधेरा छंट जाने के बाद आएंगे “.
“अरे ऐसा कुछ नहीं है.. जब शुकर मांझी साथ में है तो काहे का डरना ? .. चल.. चल के देखते है कि आवाज़ कहाँ से आ रही है.. और वहाँ क्या है ?”
“ ई साला शुकर मांझी पगलाय गेल हो मर्धे… लागो हो सुभे-सुभे चढ़ाय के आइल हो… एकर चक्कर में हमनी मत रोह मर्धे.. चल जल्दी भाग हिया से”.
और फिर सभी शुकर मांझी को अकेला छोड़ के वहाँ से भाग लेते हैं। शुकर मांझी मंतर पढ़ के अपने शरीर को बांधता है और आवाज़ आ रही दिशा की ओर चल पड़ता है। एक बरगद पेड़ के नीचे जहाँ से एक बड़ा सा नाला गुजरा था.. वहाँ सफ़ेद कपड़े में लिपटी एक बच्ची जोर-जोर से रो रही थी। शुकर मांझी डरते-डरते धीरे-धीरे बच्ची के पास पहुँचा और उसे 2-3 मिनट तक निहारता रहा.. फिर उसे झुक के छुआ.. और जब कन्फर्म हो गया कि ये कोई भ्रम नहीं है.. कोई भूत-वूत नहीं है तो उसे गोद में उठा लिए और हिलाते हुए चुप कराने लगे। पता नहीं कौन सी निष्ठुर माँ थी जो इस बच्ची को यहाँ जंगल में और इस नाले में छोड़ के चली गई थी …. और पता नहीं कब छोड़ के गई थी ... सियार-हुंडार, साँप-बिच्छू का यहाँ बसेरा है, लेकिन भगवान ‘मरांग बुरु’ की कृपा थी की बच्ची को खरोच तक नहीं आया था। शायद मरांग बुरु ने ही दारु पीये शुकर मांझी को उस बच्ची के पास भेजा था।… शुकर मांझी उस बच्ची को अपने गमछा में लपेटा और अपने घर ले आया।
1-2 घंटे में ही पुरे रखवा और कोदवाडीह बस्ती में हल्ला हो गया कि शुकर मांझी को जंगल में एक बच्ची मिली है। उसके घर में उस बच्ची को देखने के लिए मज़मा लग गया। बात फैलते-फैलते हमारे गाँव भी आ पहुँची। मेरे गांव में दो जन निःसंतान हैं… एक बंधन महतो और एक लालू तुरी जो नावाडीह थाने में चौकीदार है… लालू तुरी को गांव में चौकीदरवा और उनकी बीवी को चौकीदरनिया कह के बुलाते है. ये दोनों मेरे रिश्ते में दादा-दादी लगते हैं। चौकीदरनिया गांव में कुसराइन(दाई) का काम करती है… लोगों के बच्चों का डिलिवरी करने का काम करती हैं.. लेकिन देखिये भगवान की माया या फिर विडंबना कि जो औरत दूसरों को माँ बनाने में मदद करती है, वो खुद माँ नहीं बन पाई थी। गाँव में अगर ।किसी नवजात बच्चे को हाड़ी लग जाए तो सीधा चौकीदरनिया को आवाज लगाया जाता है और चौकीदरनिया सब काम छोड़ कर दौड़ी चली आती है… जो औरत एक माँ और एक बच्चे का इतना ख्याल रखती थी, उसे भगवान ने माँ के सुख से वंचित कर रखा था।
जैसे ही ये खबर उनके कान में पहुँची दौड़ते हुए सीधा शुकर मांझी के घर पहुँची.. और शुकर मांझी से बच्ची को देने का अनुरोध करने लगी। पीछे-पीछे बंधन महतो की बीवी भी पहुँच गई और उसने भी बच्ची की माँग कर दी। अब बच्ची को गोद लेने के लिए दो-दो दावेदार। लेकिन शुकर मांझी था कि किसी को देने के लिए तैयार ही नहीं। बोल रहा था कि “हम किसी को भी नहीं देंगे…. मरांग बुरु ने ये बच्ची हमको दिया है, तो हम ही इसको रखूँगा।“
शुकर मांझी के दो पुत्र और एक पुत्री थी, लेकिन फिर भी वो इस बच्ची को किसी को देने के लिए राजी नहीं हो रहा था।
समय बीतता गया तो और भी लोग जमा होने लगे… जो उधर के सम्मानित और गणमान्य व्यक्ति थे वो भी शुकर मांझी के घर पहुँच गए.. और मामला देखकर शुकर मांझी को समझाने लगे, “देखो शुकर…. तुम्हारे तो पहले से ही दो बेटे और एक बेटी है… तो तुम अभी संतान सुख का आनंद उठा रहे हो.. भले ही बाबा मरांग बुरु ने इस बच्ची की रक्षा के तुम्हें चुना, लेकिन अगर इस बच्ची के कारण किसी की सुनी गोद भर सकती है.. जो संतान सुख से अब तक वंचित है.. और तुम्हारे चलते उसमें मातृत्व और पितृत्व का भाव जगता है... तो इससे बड़ा और पुण्य का काम भला क्या हो सकता है ?? किसी निःसंतान को संतान सुख देना इस संसार का सबसे बड़ा पूण्य है और इससे बाबा मरांग बुरु भी बहुत खुश होंगे।“
काफी मान मनोवल के बाद शुकर मांझी बच्ची को किसी को देने को राजी हुआ। लेकिन अब वहाँ एक समस्या हो गई.. बच्ची को अपनाने के लिए तीन-तीन दावेदार हो गए। अब इनमें से किसे दिया जाय ??
फिर विचार हुआ और बच्ची चौकीदरनिया को सौंप दिया गया ये जानकर कि ये कुसराइन है, बच्चों के बारे में इन्हें एक-एक चीज पता है… ये बच्ची का सबसे अच्छे तरीके से ख्याल रख सकती है।
चौकीदरनिया ने सबको प्रणाम किया और बच्ची को अपने साथ लाने लगी। जब वो बच्ची को वहाँ से ले के निकली तो, वहीं सभा में मौजूद प्रयाग पाण्डेय साइकिल का पैंडल जोर से मारते हुए गाँव पहुँचे और खबर दिया कि चौकीदरनिया को उस बच्ची को दे दिया गया है और उसे वो पहड़िया वाले रास्ते से ले के आ रही है… हमलोग खबर सुनते ही पहड़िया वाले रास्ते कि ओर दौड़ भागे… सात आठ जन थे अपन… करीब पौन किलोमीटर की दौड़ाई के बाद चौकीदरनिया दिख गई… पास पहुँचते ही जिद्द करने लगे, “ आजी … आजी… नूनी के देखाव न आजी.. !!” तो चौकीदरनिया ने हमलोगों को बच्ची को दिखाया फिर हमलोग बच्ची के गाल को छू-छू कर पुचकारने लगे। फिर हमलोग साथ-साथ ही चौकीदरनिया के घर तक आये… अब तो ये खबर दावानल की भाँति फ़ैल चुकी थी… चौकीदरनिया के घर में मेला लग सा गया बच्ची को देखने के लिए… हर कोई बच्ची का मुँह देख के पैसे से नज़र उतार रहे थे।हमारी मैया ने नज़र उतारने के बाद जब बोली कि, “ चौकीदरनिया… भगवान के घरे देर है अंधेर नाय… एतना सुन्दर बेटी छौवा.. गांवा में केकरो ऐसन बेटी नाय है चौकीदरनिया जेतना सुन्दर भगवान तोरा देल हो !!!”…. इतना सुनते ही चौकीदरनिया अपने आप को रोक नहीं पायी और बच्ची को सीने से लगा कर रोने लगी… माँ फिर बोली.. “ चौकीदरनिया आईझ तोय जी भर के काइंद ले.. काहे कि तोर इ लोर ख़ुशी के हो… आर तोर हरेक लोर काली मईया के प्रसाद जइसन हो आर ओकर आभार प्रकट के माध्यम।“
और जब पुरे गाँव का देखना हो गया तो… किसी ने नामकरण की बात छेड़ दी। फिर पुरे गाँव ने एक साथ उस बच्ची का नाम “सीता कुमारी” रख दिया… और प्यार से सब उन्हें “सीतवा” बुलाने लगे।
जहाँ पूरा गाँव इस बात से खुश था, वहीं एक परिवार इससे नाख़ुश था और वो चौकीदरवा का छोटा भाई सहदेव तुरी का परिवार… क्योंकि चौकीदरवा के रिटायर के पैसा और जमीन जायदाद उनके कोई वारिस न होने के चलते उनके बेटों को ही होना था. सो उनके परिवार ने मोर्चा खोल दिया, “ ई चौकीदरनिया पता नाय केकर जन्मल गीदर उठाय के लेले अइली ही.. केकर खून के पैदाइश आर केकर वंश के.. तोरे वंश के हमर गीदर-बुतरू मइर गेल हलथिन कि एक फैंकाइल गीदर उठाय के लेले अइले ही।“
और इसी तरह से जब बात बढ़ती तो.. उन दोनों परिवारों में भयंकर झगड़ा होने लगता… पहले तो एक दो दिन गाँव वालों ने बर्दाश्त किया लेकिन तीसरे दिन की लड़ाई में मुखिया जी और अन्य लोगों ने हस्तक्षेप कर दिया और सहदेव तुरी और उसके परिवार को जम के लताड़ा और धमकी दिया गया कि “ अगर अगली बार से सीतवा को लेकर किसी भी तरह का झगड़ा हुआ तो सीधा हमलोग पुलिस केस करेंगे तुमलोगों के ऊपर.. तो आज के बाद ये ध्यान रखना”….. और तब जा के उसका परिवार शांत मारा। लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ-साथ मन-मुटाव कम होते गया। और जब सीतवा चलने-भूलने लगी तो सहदेव तुरी का बड़ा लड़का बालेश्वर तुरी अपने दुचकिया में बैठा के घुमाने भी लगा.. अपने दुचकिया के नम्बर प्लेट और आगे में “सीता” भी लिखवा लिया। पूरा गाँव सीतवा का ध्यान रखता था.. कभी मेरे घर से तो कभी चाचा के घर से और इसी तरह लगभग सभी के घर से सीतवा के दूध खीर जाता था। सीतवा चौकीदरनिया की बेटी न हो के पुरे गांव की बेटी थी और अब भी है। एक बार सीतवा बीमार पड़ थी.. पूरा सुईया-दवा के बाद भी ठीक नहीं हो रही थी तो, चौकीदरनिया ने काली मईया से मन्नत मांगी कि यदि मेरी सीतवा ठीक हो गई तो मैं सात गांव के मांगल धान के पूवा-रोटी चढ़ाऊँगी और अपने घर से ‘दड़’ देती हुई काली मड़ा तक जाऊंगी।.. और काली मईया ने चौकीदरनिया की बात सुन ली और कुछ ही दिनों में सीतवा पूरी तरह ठीक हो गई। तो चौकीदरनिया ने अपने कहे अनुसार सात गाँव में पुरे ढाक-ढोल के साथ धान माँगकर और उसका पूवा पका कर अपने घर से ‘दड़’ देते हुए काली मड़ा तक गई और काली मईया को पूवा-पकवान चढ़ाई थी।
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समय बीतता गया.. और आज सीतवा 18 साल की हो चुकी है… उसकी शादी किमोजोरिया गाँव में सेट हो गया है.. 16 तारीख को लड़के का तिलक कर के आये है… 14 अप्रैल को सीतवा का लगन बंधना है और 18 अप्रैल को शादी। चौकीदरवा चौकीदरनिया समेत पूरा गाँव खुश है और हो भी क्यों न.. क्योंकि पुरे गाँव के बेटी की जो शादी हो रही है।…
मैं जब भी गाँव जाता हूँ तो चौकीदरनिया के घर जाकर चाय ज़रूर पीता हूँ। आज फिर चौकीदरनिया के घर बैठा हूँ और चाय पी रहा हूँ… चौकीदरनिया सामने बैठी है, उनके आँखों में आँसू भरे हुए हैं फिर भी मुझसे बोल रही हैं कि, “ इंजीनियर बाबू… देख आईझ हम आपन सीतवा के बिहा कर रहल हिये, वहे सीतवा जेकर के तोय दौड़ के आइल हली पहरिया जगह देखे ले.. ओकरे बिहा कर रहल हिये… आर तोय कहिया करभी ?? जखन सीतवा के बाल-बुतरू भे जिबथिन तखन ? तोर बिहा में नाचे खातिर तो हम तरस रहल हिये इंजीनियर बाबू… कसम से तोर अंगनवा के हम धुर्रा उड़ाय देबे नाइच-नाइच के। आर तोर से बिना सीसी लियल हम मानबो नाय “.
उनका आँख से निकलते आँसू और उसका मज़ाक करना हमारी भी आँख को नम कर गया.. मैं सोच ही नहीँ पा रहा था कि प्रतिक्रिया कैसे दूँ ?
फिर जब थोड़ा शांत हुए तो बोला , “ आजी एक बात बोलियो “.
“हाँ बोल …. “
“ हम न लड़की पसंद कर लिए है !”
“के है… तनिक बताओ .. बताओ “
“ उ न…. तोर समधनिया हो !”
“ई इंजिनीयरवा कहियो न सुधरते”. …
और फिर हम सब वहाँ से निकल भागते है।.
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आज हमें यह सोचने को विवश कर रही है… मैंने दो माओं को देखा .. एक जिसने जन्म लेते ही उसे मरने के लिए उसे जंगल में छोड़ दिया… और एक माँ जिसने उसे गोद लिया और दुनिया से लड़ी। बेटी को जंगल में फेंकने का दो ही कारण हो सकता है.. एक शादी पुर्व संतान हो या दूसरा बेटे की चाह में बेटी का होना ! और मुझे यहाँ दूसरा केस ज्यादा लग रहा है। क्योंकि बच्ची रंग-रूप से किसी बड़े घर की लग रही थी… और बड़े घरों में ही ज्यादातर बेटा-बेटी का लफड़ा चलता है। आज बेटियां कहीं से भी सुरक्षित नज़र नहीं आ रही हैं। न गर्भ में और न गर्भ के बाहर। गर्भ में रही तो एबॉर्शन और गर्भ के बाहर आई तो जंगल या फिर कोई कूड़ादान … और ये कुसंस्कृति हमारे तथाकथित पढ़े-लिखे समाज में ज्यादा ही प्रचलित हो रहा है। बेटा… बेटा… बेटा… और बेटा… लेकिन बेटे को जन्म देने वाली को ही नष्ट करने पे तुले हुए हैं।… अरे तुम्हारे से तो बहुत अच्छे हमारे गाँव के अनपढ़ चौकीदरनिया जैसे लोग हैं जो दूसरे की बेटी को बेटा सिर्फ और सिर्फ संतान समझ के पालती-पोषती हैं। आज तक मैंने किसी ठेठ गाँव वालों को एबॉर्शन करते नहीं सुना है। पांच-छे बेटियों के साथ भी बड़े खुश हैं।
क्या अन्य लोग हमारी चौकीदरनिया आजी से सीख नहीं ले सकते ?
चौकीदरनिया और ऐसे ही तमाम चौकीदरनिया मेरी रोल मॉडल है वो नहीं जो बस बेटी बचाओ आंदोलन का झंडा थामे रहती हैं।
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लव यू चौकीदरनिया।।
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गंगा महतो
खोपोली।
Tuesday, 8 March 2016
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर "मन की बात"
मैं एक घर बनाऊँगा जिसमें दरवाज़े नही होंगें ! क्योंकि ?
एक दरवाज़ा होता है जिससे अनजान व्यक्ति के आने का ख़तरा बना रहता है!
एक दरवाज़ा होता है जिसकी हमें हमेशा रखवाली करनी होती है !
एक दरवाज़ा होता है जिससे समय से जाना और जिससे ससमय वापस आना होता है!
दरवाज़े पर एक जंज़ीर होती है जिसमें ताला भी लगाना परता है!
दरवाज़े पर एक छिटकिनी होती है जिसे रात में लगाना भी पड़ता है!
इसी दरवाज़े पर एक पर्दा अपनों को छुपाने के लिए भी लगाना पड़ता है!
इसी दरवाज़े पर एक दहलीज़ होती है जिसे हर कोई पार करना चाहता है!
इसी दरवाज़े पर एक चौखट होता है जो मर्यादा की सीमा को बताता है!
इसी दरवाज़े पर पाबन्दी की जंज़ीर लगी रहती है जिसे हर कोई तोड़ना चाहता है!
इसलिए जब मैं एक घर बनाऊँगा तो उसमें दरवाज़े नही होंगें!
ना दरवाज़ा होगा! ना ही ख़तरा होगा! ना रखवाली होगा! ना छिटकिनि होगा! ना ताला होगा! ना पर्दा होगा! ना दहलीज़ होगी! ना चौख़ट होगी! ना ही पाबन्दी होगी!
हर कोई खुली आँखो से सपना देख सकेगा, अपनी सच्चे सपनों के साथ खुले आकाश में पंख लगा कर उड़ सकेगा, अपनी अभिलाषा को पूरा कर सके।
Thursday, 3 March 2016
Thursday, 11 February 2016
फरवरी का महीना और सेकण्ड हैण्ड जवानी पर "मन की बात"
क़रीब रहना और क़रीब होना दोनों ही अलग अलग बात होता है।
जिनकें मुलाक़ातों में मक़सद छुपे हों, उनसें फ़ासला रखना ही बेहतर होता है।जहाँ तक प्यार का सवाल है वह एक-दो दिन में नही होता है। पहले पसंद फिर आकर्षण, उसके प्रति ईमानदार होना, नैतिक तौर पर जिम्मेदार होना, जबावदेहिता, समर्पण की भावना, सत्यनिष्ठा के साथ विश्वास भी...यह सब होते होते चार से पाँच साल लग जाते हैं उसके बाद जो एहसास उतपन्न होता है वही प्यार होता है।
आजकल सेकण्ड हैण्ड जवानी के दौर में युवा वर्ग इतने तेज़ी से आगे बढ़ रहें हैं की थोड़ा और तेज दौरे तो ओलंपिक में एक-दो मैडल मिल जाये। दो प्राणी में से एक, अपनी मानसिक या शारीरिक सुख प्राप्त के लिये दूसरे की भावनाओं के साथ फुटबॉल खेलता है।और वह इस बात कि प्रवाह भी नही करता की हर इंसान की अपनी सोचनें, समझनें, सहने की सीमा होती है... और उसके भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
अंत में बस इतना कहूँगा ....
"प्यार अगर सच्चा हो तो #विरह भी प्यारी लगती है..!
नही, तो बगल में साथ चलते हुए भी #शरीर_नज़र आती है..!!"
Monday, 21 December 2015
प्यार का पहला खत लिखने में वक़्त तो लगता है
प्यार का पहला खत लिखने में वक़्त तो लगता है
नये परिंदो को उड़ने में वक़्त तो लगता है
जिस्म की बात नही थी उनके दिल तक जाना था
लंबी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है
गाँठ अगर लग जाये तो फिर रिश्ते हो या डोरी
लाख करे कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है
हमने इलाज-ए-जख्म-ए-दिल तो ढूँढ लिया लेकिन
गहरे ज़ख़्मो को भरने में वक़्त तो लगता है
- JAGJIT SINGH
Sunday, 20 December 2015
माझी- द माउन्टेनमैन: शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद
दुनिया के पहले पहाड़तोड़वा, ‘दशरथ माझी’ के जीवन पर बनीं हिंदी फिल्म ‘माझी द माउन्टेनमैन’ एक ऐसी बायोपिक फिल्म है, जो प्रेम के उद्दात स्वरूप को प्रस्तुत करती है। प्रेम का यही उद्दात स्वरूप शानदार और जबरदस्त है इसलिए जिंदाबाद है। लेकिन इस प्रेम को जितना जिंदाबाद होना चाहिए था उतना नहीं हो पाया। क्योंकि यह एक मूस खाने वाली मुसहर जाति अर्थात दलित जाति का प्रेम था। प्रसंग बस यहाँ एक प्रसिद्द गीत का जिक्र करना लाजमी होगा ‘तवायफ कहाँ किसी से कभी मुहब्बत करती है, मगर जब करती है..तो हाय कयामत करती है’ ठीक इसी प्रकार का प्रेम दशरथ माझी का भी था जो पहाड़ के लिए क़यामत बन गया और उसके कानों में एक ही बात गूंजती रही कि ‘जबतक तोड़ेगा नहीं, तबतक छोड़ेगा नहीं’। हिन्दी सिनेमा के इतिहास में किसी दलित या आदिवासी के जीवन पर बनी संभवतः यह दूसरी फिल्म है। इसके पहले डॉ भीमराव अम्बेडकर के जीवन पर बनी एक मात्र दलित बायोपिक फिल्म देखने को मिलती है। जबकि अनेको ऐसे नाम हैं जिनपर अच्छी फिल्म बनाई जा सकती थी लेकिन सिनेमा ‘समाज’ से ज्यादा ‘अर्थ’ पर केन्द्रित होकर रह गया। खैर! ‘परिवर्तन संसार का नियम है’ और यह भी कहा जाता है कि ‘जागो तभी सबेरा’, इस प्रकार निसंदेह कहा जा सकता है कि फिल्म ‘माझी- द माउन्टेनमैन’ एक शुरुआत है जो सदियों से सताये दलित और आदिवासियों के लिए उनके द्वारा किये जा रहे लम्बे संघर्ष में उत्साहवर्धक साबित होगी।
सौ वर्ष के लम्बे सिनेमा के इतिहास में लगभग सभी विषयों पर फ़िल्में बनाई जा चुकी हैं। यहाँ तक कि किसी भी देश की तुलना में एक वर्ष में सबसे अधिक सिनेमा बनाने का रिकार्ड भी भारत के नाम है। किन्तु इतने लम्बे वर्षों के अन्तराल में दलित और आदिवासी सिनेमा हाशिये पर ही रहा है। जबकि भारतीय समाज में ‘जाति’ एक कड़वी सच्चाई है। और यही सच्चाई सिनेमाई इतिहास से लगभग गायब है। दलित और आदिवासी विषयक सिनेमा पर बात की जाय तो सौ वर्षों के इतिहास में केवल चुनिन्दा फ़िल्में ही आई हैं। और बायोपिक फ़िल्में तो नदारद ही हैं। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि सिनेमा निर्माण के क्षेत्र में दलित और आदिवासियों का न होना। कुछ हैं भी, तो वह अन्यों की तरह पूंजी के चुंगल में हैं। क्योकि ‘सिनेमा एक ऐसी कलात्मक संभावना है जिसके मूल में उसकी व्यवसायिकता निहित है’। अनुपम ओझा इसी बात को बड़े सलीके से कहते है-“मुनाफाखोरों के लिए सिनेमा सिर्फ एक उत्पाद है। जिसपर वस्तु-व्यापार के नियम लागू होते हैं। दूसरी तरफ कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने वालों के लिए सिनेमा एक भाषा है, अभियक्ति की एक कलात्मक शैली है। फिल्म कला है, परन्तु उद्योग भी है । फिल्म की समस्त कलात्मक सम्भावनाओं के मूल में प्रमुख रूप से उसकी व्यवसायिकता ही रही है”।[1]
इस फिल्म का निर्देशन केतन मेहता ने किया है, जो बायोपिक सिनेमा के लिए जाने जाते हैं। ‘दशरथ माझी’ के अलावा ये ‘बल्लभभाई पटेल’, ‘मंगल पांडे’ और ‘राजा रवि वर्मा’ पर बायोपिक फिल्म बना चुके हैं। ‘माझी द माउन्टेनमैन’ में मुख्य कलाकार के रूप में नवाजुद्दीन सिद्दकी और राधिका आप्टे हैं जो क्रमशः दशरथ माझी और फगुनिया की भूमिका में हैं। फगुनिया दशरथ माझी की पत्नी का नाम है। इन दोनों कलाकारों ने इस फिल्म में अपने चरित्र को न सिर्फ जीवंत किया है बल्कि जिया भी है। फिल्म का मुख्य कथानक माझी का प्रेम, प्रण और पहाड़ है, और साथ ही साथ दलितों के शोषण, अत्याचार और संघर्ष की उपकथा भी है। जिसको बहुत ही गहन अध्ययन के बाद सलीके से पिरोया गया है। वस्तुतः शानदार, जबरदस्त और जिंदाबाद है।
फिल्म का कथानक इस प्रकार है- बिहार के गया जिले का क़स्बा है वजीरगंज जो एक पहाड़ी के पास बसा है और उसी पहाड़ी के पार है गहलौर गाँव, जहाँ दशरथ माझी का जन्म हुआ था। गेहलौर गांव की तरक्की में सबसे बड़ी रूकावट यही पहाड़ है। यहाँ के लोगों को अपनी किसी भी बुनियादी सुविधा के लिए वजीरगंज जाना पड़ता है। क्योंकि वजीरगंज में ही स्कूल, अस्पताल, बाजार और रेलवे स्टेशन है। गहलौर गाँव से वजीरगंज सीधे-सीधे तो बहुत नजदीक है लेकिन पहाड़ को घूमकर जाने में यहाँ के लोगों को लगभग चालीस मील की दूरी तय करनी पड़ती है। इसमें समय बरबाद होता है और इसी पहाड़ के कारण आजादी के सालों बाद भी सुविधाएं गेहलौर गाँव तक नहीं पहुँच पाई हैं।
दशरथ मांझी का बाल विवाह फगुनिया के साथ होता है। दशरथ के पिता जमीदार के यहाँ बंधुआ मजदुर हैं। कर्ज न चुका पाने के कारण जमीदार दशरथ को बंधुआ मजदूर बनाने के लिए कहता है। लेकिन साहसी दशरथ उनके चुंगल से बचकर भाग खड़ा होता है। और धनबाद के कोयला खादान में जाकर काम करता है।सात साल बाद जब वह गाँव वापस आता है तब भी उसका गाँव वैसा का वैसा ही है। रास्ते में समाचार पत्र और अन्य गाँव के लोगों से पता चलता की सरकार ने छुआछूत ख़तम कर दिया है। इसलिए गाँव आते ही बिना कुछ सोचे समझे जमीदार का पैर और उसके लडके को गले लगता है। पर ज्योंही जमीदार को पता चलता है कि यह मुसहर दशरथ है उसकी खूब धुनाई होती है। घर जाकर अपने पिता और मित्रों से मिलता है। माँ के मरने के बाद घर में घर में स्त्री की जरुरत होती है। वह पत्नी को विदा कराने के लिए पिता के साथ उसके घर जाता है। लेकिन फगुनिया का पिता विदा करने से माना कर देता है। अंततः उसे फगुनिया को भागकर घर लाना पड़ता है। दशरथ अपनी पत्नी से इतना प्यार करता है कि वह उसके लिए कुछ भी कर सकता है।
एक दिन दशरथ मांझी की पत्नी फगुनिया उसके लिए खाना लेकर पहाड़ चढ़कर जाती है। जहाँ उसका पैर फिसलता है और वह पहाड़ से गिर जाती है। उसे इलाज के लिए वजीरगंज ले जाया जाता है। लेकिन अस्पताल समय से न पहुँच पाने कारण उसकी मृत्यु हो जाती है। दशरथ, पत्नी के मौत का कारण उस पहाड़ को मानता है। वह विशाल पहाड़ के सामने खड़ा होकर बोलता है 'बहुत बड़ा है तु, बहुत अकड़ है तोरा में, अरे भरम है, भरम' और वह हथौड़ा लेकर अकेला ही सुबह से लेकर रात तक पहाड़ में से रास्ता बनाने में जुट जाता है। उसका यह जुनून कभी खत्म नहीं होता। वह कभी नहीं सोचता कि यह काम उसके बस की बात नहीं है। लोग उसे पागल समझते हैं, बच्चे पत्थर मारते हैं, उसके पिता नाराज होते हैं, लेकिन दशरथ इन बातों से बेखबर जुटा रहता है अपने मिशन में। 22 साल लग जाते हैं उसे पहाड़ में से रास्ता बनाने में। इस अन्तराल में उसे तमाम कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अंततः वह पहाड़ को बौना साबित कर उस पर विजय हासिल कर लेता है।
फिल्म की स्क्रिप्ट केतन मेहता और महेंद्र झाकर ने मिल कर लिखी है। फिल्म में तीन ट्रैक समानांतर चलते हैं। एक तो दशरथ की पहाड़ तोड़ने की प्रेरणास्पद कहानी, जो बताती है कि भगवान भरोसे मत बैठो, क्या पता भगवान हमारे भरोसे बैठा हो। दूसरा ट्रैक दशरथ और उसकी पत्नी फगुनिया के प्रेम का अन्तरंग दृश्य। जो केतन मेहता की व्यवसायिक दृष्टि का नतीजा है। तीसरा ट्रैक उस दौर में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल को दर्शाता है। मसलन छुआछुत को सरकार खत्म करती है। जमींदार के अत्याचार से मजबूर होकर कुछ मुसहर नक्सली बन जाते हैं। आपातकाल लगता है। पहाड़ से रास्ता निकालने के लिए दशरथ के नाम पर सरकार से जो पैसा मिलता है उसे जमीदार और सरकारी अफसर मिलकर डकार जाते हैं। दशरथ इसकी शिकायत करने के लिए 1300 किलोमीटर दूर पैदल चल कर दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पास जाता है, लेकिन पुलिस उसे भगा देती है। वन विभाग वाले पहाड़ को अपनी संपदा बता कर दशरथ को जेल में डाल देते हैं। ये राजनीतिक हलचल बताती है कि तब भी आम आदमी की नहीं सुनी जाती थी और हालात अब भी सुधरे नहीं हैं। भ्रष्टाचार और गरीबी सिर्फ नारों तक ही सीमित है।
दशरथ की कहानी में इतनी पकड़ है कि आप पूरी फिल्म आसानी से देख लेते हैं और दशरथ की हिम्मत, मेहनत और जुनून की दाद देते हैं। अखरता है कहानी को कहने का तरीका। निर्देशक केतन मेहता ने कहानी को आगे-पीछे ले जाकर प्रस्तुतिकरण को रोचक बनाना चाहा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। ये कट्स चुभते हैं। साथ ही दशरथ की प्रेम कहानी के कुछ दृश्य गैर-जरूरी लगते हैं। केतन मेहता प्रतिभाशाली निर्देशक हैं, लेकिन 'मांझी द माउंटन मैन' में उनका काम उनके बनाए गए ऊंचे स्तर से थोड़ा नीचे रहा है, बावजूद इसके उन्होंने बेहतरीन फिल्म बनाई है। अभिनय के क्षेत्र में यह फिल्म बहुत आगे है। एक से बढ़कर एक कलाकार हैं। नवाजुद्दीन सिद्दीकी अब हर रोल को यादगार बनाने लगे हैं। चाहे वो बदलापुर का विलेन हो या बजरंगी भाईजान का पत्रकार। मांझी के किरदार में तो वे घुस ही गए हैं। चूंकि नवाजुद्दीन खुद एक छोटे गांव से हैं, इसलिए उन्होंने एक ग्रामीण किरदार की बारीकियां खूब पकड़ी हैं। एक सूखे कुएं वाले दृश्य में और पहाड़ के अन्दर पानी मिलने पर पानी पीना और झाड़ की पत्तियां चबाने के समय उन्होंने कमाल का अभिनय किया है। मांझी के रूप में उनका अभिनय लंबे समय तक याद किया जाएगा।