Sunday, 6 June 2021

ये दुनिया अगर मिल भी - Ye Duniya Agar Mil Bhi


Movie/Album: प्यासा (1957)

Music By: एस.डी.बर्मन
Lyrics By: साहिर लुधियानवी
Performed By: मो.रफ़ी

ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया
ये इन्सां के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

हर इक जिस्म घायल, हर इक रूह प्यासी
निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी
ये दुनिया अगर मिल भी...

यहाँ इक खिलौना है इन्सां की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती
ये दुनिया अगर मिल भी...

जवानी भटकती हैं बदकार बन कर
जवाँ जिस्म सजते हैं बाज़ार बन कर
यहाँ प्यार होता है व्योपार बन कर
ये दुनिया अगर मिल भी...

ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है 
जहाँ प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है  
ये दुनिया अगर मिल भी...

जला दो इसे फूंक डालो ये दुनिया
जला दो, जला दो, जला दो
जला दो इसे फूंक डालो ये दुनिया
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी...

Friday, 20 November 2020

धर्मप्रेमिका

जो प्रेम गली में आया ही नहीं
प्रीतम का ठिकाना क्या जाने…

जिसने कभी प्रीत लगाई नहीं
वो प्रीत निभाना क्या जाने…..

Thursday, 2 January 2020

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया…


कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिस काम का बोझा सर पे हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिस इश्क़ का चर्चा घर पे हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो मटर सरीखा हल्का हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना दूर तहलका हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें ना जान रगड़ती हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना बात बिगड़ती हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें साला दिल रो जाए
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो आसानी से हो जाए…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो मज़ा नहीं दे व्हिस्की का
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना मौक़ा सिसकी का…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसकी ना शक्ल इबादत हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसकी दरकार इजाज़त हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो कहे ‘घूम और ठग ले बे’
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो कहे ‘चूम और भग ले बे’…

वो काम भला क्या काम हुआ
कि मज़दूरी का धोखा हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो मजबूरी का मौक़ा हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें ना ठसक सिकंदर की
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें ना ठरक हो अंदर की…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो कड़वी घूंट सरीखा हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जिसमें सब कुछ ही मीठा हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो लब की मुस्कां खोता हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो सबकी सुन के होता हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो ‘वातानुकूलित’ हो बस
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो ‘हांफ के कर दे चित’ बस…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें ना ढेर पसीना हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो ना भीगा ना झीना हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें ना लहू महकता हो
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो इक चुम्बन में थकता हो…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें अमरीका बाप बने
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो वियतनाम का शाप बने…

वो काम भला क्या काम हुआ
जो बिन लादेन को भा जाए
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो चबा…’मुशर्रफ’ खा जाए…

वो काम भला क्या काम हुआ
जिसमें संसद की रंगरलियां
वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ
जो रंगे गोधरा की गलियां…


2


अरे, जाना कहां है…?

उस घर से हमको चिढ़ थी जिस घर
हरदम हमें आराम मिला…
उस राह से हमको घिन थी जिस पर
हरदम हमें सलाम मिला…

उस भरे मदरसे से थक बैठे
हरदम जहां इनाम मिला…
उस दुकां पे जाना भूल गए
जिस पे सामां बिन दाम मिला…

हम नहीं हाथ को मिला सके
जब मुस्काता शैतान मिला…
और खुलेआम यूं झूम उठे
जब पहला वो इन्सान मिला…

फिर आज तलक ना समझ सके
कि क्योंकर आखिर उसी रोज़
वो शहर छोड़ के जाने का
हम को रूखा ऐलान मिला…



लेखक :-पीयूष मिश्रा

हम देखेंगे

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल[1] में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां [2]
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महक़ूमों के पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम [3]
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर[4] भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

लेखक:-  फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 

शब्दार्थ

ऊपर जायें↑ 1  सनातन पन्ना

ऊपर जायें↑ 2 घने पहाड़

ऊपर जायें↑ 3 पवित्रता या ईश्वर से वियोग

ऊपर जायें↑ 4 देखने वाला


कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया 


वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे

जो इश्क़ को काम समझते थे

या काम से आशिक़ी करते थे

हम जीते-जी मसरूफ़ रहे

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

काम इश्क़ के आड़े आता रहा

और इश्क़ से काम उलझता रहा

फिर आख़िर तंग आ कर हम ने

दोनों को अधूरा छोड़ दिया


लेखक :- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

Friday, 22 November 2019

आने वाले हैं शिकारी मेरे गाँव में,

आने वाले हैं शिकारी मेरे गाँव में,
जनता है चिंता की मारी मेरे गाँव में।
आने वाले हे शिकारी मेरे गाँव में,
जनता हे चिंता की मारी मेरे गाँव में।


फिर वही चोराहे होंगे
प्यासी आखों उठाए होंगे
सपनो भोगी रातें होंगी
मीठी-मीठी बातें होंगी
मालाएं पहनानी होंगी
फिर ताली बजवानी होंगी
दिन को रात कहा जायेगा
दो को सात कहा जायेगा
आने वाले हें- आने वाले हें मदारी मेरे गाँव में
जनता हे चिंता की मारी मेरे गाँव में।


शब्दों-शब्दों आहें होंगी
लेकिन नकली बाहें होंगी
तुम कहते हो नेता होंगे
लेकिन वे अभिनेता होंगे
बाहर-बाहर सज्जन होंगे
भीतर-भीतर रहजन होंगे
सब कुछ हे,फिर भी मांगेगे
झुकने की सीमा लाघेगें
आने वाले हें भिखारी मेरे गाँव में
जनता हे चिंता की मारी मेरे गाँव में।


उनकी चिंता जग से न्यारी
कुर्सी हे दुनिया से प्यारी
कुर्सी हे तो भी खल्कामी
बिन कुर्सी के भी दुस्कामी
कुर्सी रास्ता कुर्सी मंदिर
कुर्सी नदियां कुर्सी शाहिल
कुर्सी पर ईमान लुटायें
सब कुछ अपना दावं लगायें
आने वाले हैं- आने वाले हैं जुआरी मेरे गाँव में
जनता हे चिंता की मारी मेरे गाँव में।

#वरिष्ठ_गीतकार_श्री_राजेंद्र_राजन_जी_की_प्रस्तुति


Sunday, 1 September 2019

गाना / Title: जिहाल-ए-मस्ती, मकुन-ब-रन्जिश - jihaal-e-mastii, makun-b-ranjish

चित्रपट / Film: Gulaami 1985
गीतकार / Lyricist: गुलजार-(Gulzar)
गायक / Singer(s): लता मंगेशकर-Lata Mangeshkar - Shabbir Kumar

जिहाल-ए-मस्ती मकुन-ब-रन्जिश,
बहाल-ए-हिज्र बेचारा दिल है

सुनाई देती है जिसकी धड़कन
तुम्हारा दिल या हमारा दिल है

वो आके पहलू में ऐसे बैठे
के शाम रंगीन हो गई है (३)
ज़रा ज़रा सी खिली तबीयत
ज़रा सी ग़मगीन हो गई है

(कभी कभी शाम ऐसे ढलती है
के जैसे घूँघट उतर रहा है ) - २
तुम्हारे सीने से उठ था धुआँ
हमारे दिल से गुज़ार रहा है

ये शर्म है या हया है क्या है
नजर उठाते ही झुक गयी है
तुम्हारी पलकों से गिरके शबनम
हमारी आँखों में रुक गयी है

खुसरो का वह गीत जिससे गुलज़ार को प्रेरणा मिली थी।

अमीर खुसरो ने एक गीत (तकनीकी तौर पर इसे क्या कहेंगे मैं नहीं बता सकता) लिखा जिसकी खासियत यह थी कि इसकी पहली पंक्ति फ़ारसी में थी जबकि दूसरी पंक्ति ब्रज भाषा में। फ़िल्म के गीत की तर्ज पर ही खुसरो के इस गीत को भी पढ़ें। गजब के शब्द.. कमाल की शब्दों की जादूगरी।

ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल, (फ़ारसी)
दुराये नैना बनाये बतियां | (ब्रज)
कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऎ जान, (फ़ारसी)
न लेहो काहे लगाये छतियां || (ब्रज)

शबां-ए-हिजरां दरज़ चूं ज़ुल्फ़
वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह, (फ़ारसी)
सखि पिया को जो मैं न देखूं
तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां || (ब्रज)

यकायक अज़ दिल, दो चश्म-ए-जादू
ब सद फ़रेबम बाबुर्द तस्कीं, (फ़ारसी)
किसे पडी है जो जा सुनावे
पियारे पी को हमारी बतियां || (ब्रज)

चो शमा सोज़ान, चो ज़र्रा हैरान
हमेशा गिरयान, बे इश्क आं मेह | (फ़ारसी)
न नींद नैना, ना अंग चैना
ना आप आवें, न भेजें पतियां || (ब्रज)

बहक्क-ए-रोज़े, विसाल-ए-दिलबर
कि दाद मारा, गरीब खुसरौ | (फ़ारसी)
सपेट मन के, वराये राखूं
जो जाये पांव, पिया के खटियां || (ब्रज)

चाहें अमीर खुसरो हों जिनके सूफ़ी गीत आज भी उनके चाहने वालों की पहली पसंद हैं और चाहें गुलज़ार जो पिछले पाँच से छह दशकों से एक के बाद एक नायाब गीत हमें दे रहे हैं.. दोनों का ही अपने क्षेत्र में कोई मुकाबला नहीं।

Friday, 9 November 2018

अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसि!

चाहता था जब हृदय बनना तुम्हारा ही पुजारी,
छीनकर सर्वस्व मेरा तब कहा तुमने भिखारी,
आँसुओं से रात दिन मैंने चरण धोये तुम्हारे,
पर न भीगी एक क्षण भी चिर निठुर चितवन तुम्हारी,
जब तरस कर आज पूजा-भावना ही मर चुकी है,
तुम चलीं मुझको दिखाने भावमय संसार प्रेयसि!
अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसि!
भावना ही जब नहीं तो व्यर्थ पूजन और अर्चन,
व्यर्थ है फिर देवता भी, व्यर्थ फिर मन का समर्पण,
सत्य तो यह है कि जग में पूज्य केवल भावना ही,
देवता तो भावना की तृप्ति का बस एक साधन,
तृप्ति का वरदान दोनों के परे जो-वह समय है,
जब समय ही वह न तो फिर व्यर्थ सब आधार प्रेयसि!
अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसि!
अब मचलते हैं न नयनों में कभी रंगीन सपने,
हैं गये भर से थे जो हृदय में घाव तुमने,
कल्पना में अब परी बनकर उतर पाती नहीं तुम,
पास जो थे हैं स्वयं तुमने मिटाये चिह्न अपने,
दग्ध मन में जब तुम्हारी याद ही बाक़ी न कोई,
फिर कहाँ से मैं करूँ आरम्भ यह व्यापार प्रेयसि!
अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसि!
अश्रु-सी है आज तिरती याद उस दिन की नजर में,
थी पड़ी जब नाव अपनी काल तूफ़ानी भँवर में,
कूल पर तब हो खड़ीं तुम व्यंग मुझ पर कर रही थीं,
पा सका था पार मैं खुद डूबकर सागर-लहर में,
हर लहर ही आज जब लगने लगी है पार मुझको,
तुम चलीं देने मुझे तब एक जड़ पतवार प्रेयसि!
अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसि!
~ गोपालदास "नीरज"

Tuesday, 20 February 2018

जय राज संग स्नेहा भारती

तेरे हर घर द्वार को आज मैं,आठो धाम लिखता हूँ
मिलन के इस अर्द्ध रात को आज अपने जीवन का सवेरा लिखता हूँ
अपनी सारी चल अचल साँसे तेरे नाम लिखता हूँ
गंगोत्री से गंगासागर तक खुद को समर्पित कर तेरे नाम लिखता हूँ
तेरी हर खुशी को अपनी खुशी मानूंगा ऐ बात सर झुका कर लिखता हूँ

तेरी माथे की बिंदिया को अपने जीवन का उगता हुआ सूरज लिखता हूँ

तेरी पाँव के रुनझुन को अपने जीवन का धुन लिखता हूँ
अपनी धड़कन का नाम भी, आज से तेरा ही नाम रख दिया हूँ यह बात भी लिखता हूँ

मैं राम तो नही फिर भी सीता समझ कर तुम्हें स्वीकार करता हूँ

सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए ....
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं...!!

Monday, 5 February 2018

पैडमैन

तमिलनाडु के अरणाचलम मुरगनाथम की बायोपिक #पैडमैन के रिलीज होनें के बाद भी शायद स्थिति कमोबेश वही रहेगी...
इस फ़िल्म को लेकर मुझे कोई ज्यादा उम्मीद नही है क्योंकि रील लाइफ और रियल लाइफ में अंतर होता है।
समस्या पहले भी और आगे भी रहेगी क्योंकि प्रश्न वही पुराना है??

ग्रामीण महिलाएं सेनिटरी पैड का इस्तेमाल क्यों नही करती है ? शायद नही बल्कि यही उत्तर है
1. ग्रामीण महिलाएं सेनिटरी पैड खरीदने में सक्षम नही है..अधिकांशतः कपड़ों का उपयोग करती है
2. उन तक सेनिटरी पैड की पहुँच नही है
3. उन्हें यह मालूम है या नही की सेनिटरी नैपकिन किस बला का नाम है,आखिर होता क्या है
4. नैपकिन की खरीदारी और उपयोग में संकोच एवं शर्म आना
5. मूलतः गाँव मे सेनिटरी पैड सहज व सुलभ नही है
6. पुरुषों से ग्रामीण महिलाएं सेनिटरी नैपकिन माँग ही नही सकती है।
7. शहरों में आज भी दुकानदार पैड को काली पॉलीथिन में देते हैं तो ग्रामीण स्तर की हालत और भी खराब है।

#सुझाव
1. खरीदनें में आसानी हो इसके लिए सेनिटरी नैपकिन/पैड का नाम बदल कर # सहेली कर दिया जाए..
2. महिला स्वंय सहायता समूह और आशा के मदद से ग्रामीण स्तर पर इसका निर्माण किया जाए ताकि उपयोग में सहजता एवं लागत और खरीदने में आसानी हो
3. ग्रामीण स्कूल में बालिकाओं के लिए निःशुल्क सहेली (पैड) का वितरण
4. महिला के स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे पर ग्रामीण स्तर पर चौपाल का आयोजन जिसमें महिला भी शामिल हो

#सहेली(पैड) के निर्माण कंपनी के लिए दिशा निर्देश
1. महिला द्वारा सहेली के उपयोग के बाद उसे फेंकने का उचित प्रबंधन किया जाए ताकि सफाईकर्मी (कूड़ावाला) उस से दूरी नही बनायें। सुझाव के तोर पर सहेली के निर्माण कंपनी को प्रति सहेली(पैड) फेंकने के लिए अलग रैपर या पैकेट की व्यवस्था, सहेली के खरीदारी के साथ ही दिया जाए ताकि महिलाओं को फेकने में दिक्कत ना हो।
2. सहेली के tv पर प्रचार-प्रसार करते वक्त नीली स्याही का प्रयोग करता है। उसके बदले लाल स्याही का प्रयोग करे ताकि लोगों को इसकी सच्चाई पता चले और इसको लेकर समझदारी बढ़े।

#सरकार से आग्रह
1. सभी स्कूलों, कॉलेज, स्टेशन, बस स्टॉप और सरकारी भवन में सहेली-बॉक्स लगाया जाए ताकि महिला निःशुल्क वहाँ से सहेली प्राप्त कर सके
2. सहेली पर किसी तरह का कर (GST) नही लगाया जाए
3. महिलाओं को महीनें में 2 दिन विशेषावकाश(प्रकृति अवकाश) सभी सरकारी, गैर सरकारी, संगठित और गैर संगठित क्षेत्र में लागू किया जाए वो भी बिना पूर्व आवेदन के।

और अंत में
जो लिख रहा हूँ उसका संबंध मातृत्व की पहचान से है, सृष्टि सृजन करता का अस्तित्व की निशानी से है!!

Friday, 13 October 2017

धर्मप्रेमिका !

तुम ही मेरी गंगोत्री, तुम ही मेरी गंगासागर !

अब तुम ही बता दो, मुझे कहाँ डुबकी लगाना है !!

Thursday, 24 August 2017

बढ़ता भ्रष्टाचार..डूबता बिहार

हम सब बाढ़ के साथ सृजन घोटाला का मजा ले रहे हैं ...बिहार और बिहारी का यही अंदाज सभी से अलग करता है और खास बनाता है ... समस्या(बाढ़ ) कतना भी क्यों न हो जुगार(सृजन) लगा कर मुस्कराना जरुर पड़ता है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अंतरात्मा की आवाज सिर्फ 24 घंटे के अंदर त्यागपत्र देकर फिर से मुख्यमंत्री बनने में सुनाई देता है... बाढ़ में हर साल मरते आदमी की आवाज सुनाई नही देता है ... जबकी 12 साल से बिहार के मुख्यमंत्री पद पर बैठ कर मजा लुट रहें है..अब कितना विकास के लिए समय दिया जाय ...

प्रधानमंत्री स्वच्छता अभियान के तहत अभी जरा सा झाड़ू उत्तर बिहार के मित्रों और भाईओं एवम् बहनों के यहाँ लगा दे तब समझ आएगा ... गंदगी कितनी है..पानी कितना है ..समस्या कितना है..और यहाँ के लोगों का जान कितना सस्ता है.

अमित शाह जहाँ चुनाव नही होता वहाँ जाते नही हैं .. दिखावे के लिए दलित घर में खाना खाते हैं और पानी पीते हैं .. इसको बोलो अररिया/सहरसा /मधेपुरा/सुपौल/दरभंगा आकर दलित के घर खाना खाने (सरकारी चुरा चीनी )के लिएऔर कोसी नदी का पानी पीने के लिए..तब समझ आयेगा गरीब का भूख और उसका खाना क्या होता है ?

लालू यादव अपने जवान बेटो को बाढ़ क्षेत्र में नही भेजता है .. 27 तारीख के रैली का तैयारी करबा रहा है ..बिहार की लोग डूबे मरे इस से इसको कोई मतलब नही बस इसके रैली में भीड़ होना चाहिए.. इसको कभी भी बिहार के लोगों की चिंता होती ही नही है..


बिहार में प्रत्येक 2 महीनें में भ्रष्टाचार होता है..सब नेता उसी से बचने के लिए दिमाग लगायेगा उसके बाद अगले महीने फिर से अगला भ्रष्टाचार...यह चलता रहता है... मुख्यमंत्री कोई रहें कोई फर्क नही पड़ता है ..लालू रहे या नीतीश...

और अंत में...

उत्तर बिहार के आंचल में लिखा है बाढ़ ..इसी के गोद में जन्म लेना है, खेलना है , बड़ा होना है और इसी में एक दिन डूब कर मर जाना है....

Monday, 21 August 2017

घर से भी कभी निकल कर देखो....

घर से कभी निकल कर देखो
कभी जलती धूप में तप कर देखो..
बारिस में खुद को डुबो कर देखो
सर्द मौसम में कभी कांप कर देखो...

जिंदगी क्या चीज होती है ?
किताबों के सागर से निकल कर देखो...

कभी आँखों का धोख़ा हो सकता है
फासलों की दूरी मिटा कर देखो...

मिले न मिले, इंतज़ार कर के देखो
अपनों के संग दो वक़्त गुजार कर देखो...

मुहब्बत क्या चीज़ होती है ?
दो क़दम हाथ थाम कर चल कर देखो...

Saturday, 19 August 2017

दुःशासन चीर हरण :- द्रौपदी


बहुत हो गया है तिरस्कार तुम्हारा
अबकी बार चीर हरण दुःशासन का होगा
दुःशासन तब पुकारेगा...हाय दुर्योधन...हाय दुर्योधन....
अब मुझे बचाओ..मेरा चीर बढ़ा कर मेरी लाज़ बचा...
अपना सच में तू पुरुषार्थ दिखा दुर्योधन...
हाय दुर्योदधन...हाय दुर्योधन..मेरी लाज़ बचा....
कृष्ण बगल में खड़ा होकर मुस्कुरायेगा....
द्रौपदी उसे रणभूमि चलनें के लिए ललकारी गी....
युधिष्ठिर अपने किये पर पचतायेगा( जुआ खेल कर द्रौपदी को हारनें पर)
अर्जुन अबकी बार गीता का पाठ न पढ़ कर, पहले से ही कुरुक्षेत्र में जाकर हुंकारेगा.....
भीम प्रतिज्ञा छोड़ अपनी गदा घुमायेगा...
भीष्मपितामह के आँखों में सच में आँसू आयेगा (ख़ुशी के)
यह सब होता सुनकर, धृतराष्ट्र अपनी अंधी आँखो से भी देख पायेगा....
तब सच में कहेगा, द्रौपदी चीर हरण सच में भयावा था....
हे! आधुनिक मानव अब तो तुम इसे बंद करो।

Tuesday, 25 July 2017

मेरी रश्के-कमर , तूने पहली नजर, जब नजर से मिलायी मज़ा आ गया 

मेरी रश्के-कमर , तूने पहली नजर, जब नजर से मिलायी मज़ा आ गया 
बर्क़ सी गिर गयी , काम ही कर गयी, आग ऐसी लगायी मज़ा आ गया ||

रश्क-ए-क़मर (रस्के-कमर) = इतने खूबसूरत की चाँद भी जलता हो जिसकी खूबसूरती से

बर्क़ = बिजली गिरना 

जाम में घोलकर हुस्न कि मस्तियाँ, चांदनी मुस्कुरायी मज़ा आ गया | 
चाँद के साये में ऐ मेरे साक़िया, तूने ऐसी पिलायी मज़ा आ गया ||

नशा शीशे में अगड़ाई लेने लगा, बज्मे-रिंदा में सागर खनकने लगा |
मैकदे पे बरसने लगी मस्तिया, जब घटा गिर के छायी मज़ा आ गया ||

बे-हिज़ाबाना  वो सामने आ गए, और जवानी जवानी से टकरा गयी || 
आँख उनकी लड़ी यूँ मेरी आँख से , देखकर ये लड़ाई मज़ा आ गया 

बे-हिज़ाबाना = बिना नक़ाब या परदे के 

आँख में थी हया हर मुलाकात पर , सुर्ख आरिज़ हुए वस्ल की बात पर |
उसने शरमा के मेरे सवालात पे, ऐसे गर्दन झुकाई मज़ा आ गया ||

आरिज़ = कपोल, वस्ल = मिलने 

शैख़ साहिब का ईमान बिक ही गया, देखकर हुस्न-ऐ-साक़ी पिघल ही गया |
आज से पहले ये कितने मगरूर थे, लूट गयी पारसाई मज़ा आ गया ||

पारसाई = पवित्रता, छूकर किसी को सोना बना देने का वरदान ||

ऐ “फ़ना” शुक्र है आज वादे फ़ना, उस ने रख ली मेरे प्यार की आबरू |
अपने हाथों से उसने मेरी कब्र पर, चादर-ऐ-गुल ल चढ़ाई मज़ा आ गया ||

चादर-ऐ-गुल = फूलों की चादर या गुलदस्ता

Saturday, 15 July 2017

धर्मप्रेमिका !


अपनें #जेवर की बक्से में रख कर छुपा लो मुझे..

बाहर की दुनियाँ में बहुत खरीद बिक्री है...

कुछ वक़्त साथ रहेंगें मेरी भी #क़ीमत बढ़ जायेगी..

Monday, 10 July 2017

धर्मप्रेमिका !

प्यार में थोड़ा सा पागलपन होना जरूरी है.....!

खुद उसका हो तो खुद के अंदर उसको ढूढ़ना जरूरी है....!!

Wednesday, 5 July 2017

ख़रीद बिक्री कार्यक्रम

दहेज़ गरीबी हटाओ कार्यक्रम भी है।
दहेज़ लेनें के बाद जेंटलमैन रातो_रात अमीर हो जाता है।
एक तरफ कोई मेहनत के पसीने से रुपया गिनता है वहीं दूसरी तरफ कोई थूक लगा कर रुपया गिनता है।

मामला तलाक का नही बल्कि अधिकार का है!

जिस प्रकार तीन बार नौकरी नौकरी नौकरी कहनें से कुछ भी नही होता है। उसी प्रकार तीन बार तलाक़ तलाक़ तलाक़ कहनें से कुछ नही होता है, बस फ़र्क इतना है कि खुल्ला सांड बन जाता है।
आँखों देखी घटना है:-- मेरे ही गाँव में मुस्लिम परिवार में करीम की माई रहती है और करीम बाप को तब तक झाड़ू से झाड़ती है जबतक की झाड़ू का पूरा सिक खुल के ज़मीन पर बिखर न जाये।यह घटना घर के अंदर हो या सड़क पर दोनों जगहों पर किसी तरह का भेदभाव नही करती है झाड़ू चलाने की गति में, उसे घुमाने में, उसपर लगनें वाले बल पर किसी तरह का बदलाव पसंद नही करती है ।करीम बाप को इतनी भी हिम्मत नही है की वह सिर्फ़ तीन बार बोल दे मुझे छोड़ दो! छोड़ दो! छोड़ दो!.....
क्योंकि करीम माई का बाहुबल तथा उसका अभिव्यक्ति की आजादी का मुकाबला पुरे टोला और गाँव में करनें वाला कोई नही है।
अब मुद्दा पर आता हूँ..
जिस दिन मुस्लिम महिला, पुरुष के तुलना में ज्यादा मजबूत मानसिक तौर पर, आर्थिक तौर पर, बाहुबल के तौर पर, शिक्षा के क्षेत्र में, अभिव्यक्ति में हो जायेगी उसी दिन से जो मुल्ला अभी फरमान सुनाता है उसका दाढ़ी का एक एक बाल नोच लेगी।
तलाक़ भी देख कर दिया जाता है कि सामनें वाली महिला कितनी लाचार, वेवश, कमजोर, अशिक्षित, पारिवारिक स्थिति, आर्थिक निर्बलता से घिरी हुई है और जहां पर रहती है वहां का सामाजिक संरचना कैसा है आदि सब ध्यान में रख कर तलाक जैसे शब्द का लाभ उठाता है।
मुल्ला को पता नही होता है कि उसकी भी बेटी, बहन, पोती, भान्जी, भतीजी, माँ, नानी, दादी, काकी, चाची, मौसी,बुआ अपनी पूरी जिंदगी भर इन तीन शब्द के तले दबी रहती है और इसके लिए क्या क्या नही करना, सुनना, सहना पड़ता होगा...।
#और_अंत_में....
तलाक कुछ भी नही बस एक मात्र उच्च कोटि का शोषण का माध्यम है।
हम सब मिलकर तमाम धार्मिक, सामाजिक, परम्परागत रीतिरिवाज, रूढ़िवादी नियम या कानून को लात मार के फेंक देगें जो मनुष्य का शोषण का माध्यम हो तथा वह विकास के पथ का बाधक हो और हमारी स्वतंत्रता छिनता हो।

Tuesday, 20 June 2017

सूरत नही सीरत देखें..

बाजार में एक नया शब्द चला रहा है #BP जिसका प्रयोग एवं उपयोग भोली सूरत वाले अपनें चोचला प्रकार के तर्क के आधार पर धुँआधार फायदा उठा रहा है।
मैं बात कर रहा हूँ BP यानि कि बलत्कार प्यार के आड़ में! गाँव घर की भाषा में BP को ही बलत्कारी पुरूष भी कहते हैं।
हमारे आसपास कुछ सरा हुआ महाघटिया आदमी होता है, जो महान आत्मा का रूप धारण किये  रहता है और अपनें चोंच को हमेशा सी कर रखता है ताकि ऱाज बाहर ना हो सके।
फ़ेयर एंड लवली, बोरो प्लस, सुखा पॉउडर, जूता-मौजा के बिना यह अपनें घोसले से बाहर कभी निकलता भी नही है।
लड़की इसके कुतयापा पर फ़िदा हो जाती है और लड़का अपने पूर्वअनुभव के जाल में फिर से एक नई मछली को फसाता है। जिसे विश्वास के कढ़ाई में प्यार के तेल पर फ्राई कर खाता है। यहाँ तक कि शादी का वादा भी करता है और बाद में धर्म,जाति, परिवार, और पिताजी सरणम् गच्छामि! बोलता है।
मतलब बिल्कुल साफ़ है ये जो महान आत्मा हैं हमारे गली मोहल्ला घूम घूम कर गंदगी और दुर्गन्ध फैलाते रहता है और जब इसकी अपनी खुद कि शादी की बारी आये तो वर्जिन पत्नी का डिमांड रखता है या उसकी खोज करता है। यह व्यक्ति अपनी सुतयापा की सारी हदे पार करता है।
और अंत में...
इस तरह का आदमी जहाँ कहीं मिले घनघोर तरीके से विरोध करें, नही तो यह महान आत्मा जो मुखोटा पहन कर घूमता है, साधरण आदमी का उपयोग कर अपने अंजाम को अपने मंजिल तक जरूर पहुँचाता है। इसलिए सावधान रहें और तावरतोड़ विरोध करें।

Sunday, 4 June 2017

धर्मप्रेमिका !

मोहब्बत क्या होती है..?

यदि कृष्ण से पूछोगे तो वो दिल लगाना ही कहेगा!
गलती से मीरा से पूछोगे तो वो इंतज़ार करना ही कहेगी !!

Tuesday, 16 May 2017

अच्छे दिन का इंतज़ार और मेरी तन्हाई---: पटना

सुकून का एक पल पानें के लिए घर से निकले..
बदले में शाम तक तन्हाई का पूरा शहर ही मिल गया।

जीना है एक दिन इसके लिए जी रहे थे।
क्या पता था मुझे यह एक दिन मौत तक पहुँचा देगी।।

कमबख्त जिंदगी भी शतरंज जैसी हो गई है
नही खेले तो द्रौपदी की तरह बिना खेले हारनें का डर।
अगर शतरंज की चाल चलो तो अपनों का खोनें का डर।।

Thursday, 11 May 2017

पटना से खगड़िया :- राज्यरानी एक्सप्रेस

अभी राज्यरानी एक्सप्रेस में हूँ पटना से जिला खगड़िया जा रहा हूँ..
यह ट्रेन गंगा के किनारे से शुरू होती है और ताल क्षेत्र होते हुए कोसी के आँचल तक भ्रमण कराती है। दूसरी ओर यह ट्रेन एक विकासशील क्षेत्र से पिछड़े क्षेत्र को जोड़ने का काम करती है।
सीट नही मिला है मेरी इस हालत को देख कर एक सज्जन बोले पेपर बिछा कर नीचे बैठ जाओ नही तो यह भी नही मिलेगा।
मेरे बगल वाले ने बिहार के हालात पर राजनीति पर चर्चा शुरू करते हुए भ्रष्टाचार, शराबबंदी, लालू, बाढ़ पर अपना तीन-चार तीर छोर दिया है और इसके जबावी कार्यवाही में विपक्षी ने इसके तर्क को अपने चने के भुंजा के साथ चवा गया है..
एक युवक सीट की खोज में एक बूढ़े बाबा को अपना निशाना बनाया है, बाबा अपने झोले और दोनों पैर को सीट पर रख कर यात्रा का आनंद ले रहे थे अचानक अपनी इस सत्ता को खोते देख कर बाबा बीमार हो गयें हैं.... अब बीमारू बाबा और युवक में जंग छीर चूका है अब देखते है सीट युद्ध में कौन बाजी मरता है
और अंत में..
यह महारानी ट्रेन अपनी आदत के विपरीत चाल में चल रही है पता नही कब मुझे मेरी मंजिल पर पहुचायेगी...!

Thursday, 27 April 2017

धर्मप्रेमिका

शतरंज मे वज़ीर
और
ज़िंदगी मे ज़मीर,
अगर मर जाए तो समझिए खेल ख़त्म....

https://t.co/JUHOOclESy

Monday, 24 April 2017

सेनिटरी नैपकिन और लगान

चुनाव में हारे हुए अरुण जेटली भैयाजी को वित्त मंत्रालय मिलनें पर आधी आबादी को अब ज़रूर दुःख हो रहा होगा।क्योंकि इनको समझ में नही आ रहा है की #सेनिटरी_नैपकिन महिलाओं की जरूरत है ना की इनकी लगान वसूली की सामान। जिससे वे अपना तिजोरी भर सके।
अभी भी अधिकांशतः ग्रामीण महिलाएं पैसे के आभाव में तथा सुविधा और सही जानकारी के आभाव में सेनिटरी नैपकिन का इस्तमाल नही कर पाती है।वहीं अभी भी महिलाओं को इसके खरीदारी में संकोच और समस्याएं होती है।
चूँकि यह कोई लग्ज़री या विलासता की वस्तु नही है इसलिए इसे GST से बहार कर के टैक्स-फ़्री करें। और स्वच्छ, स्वस्थ्य और प्रगतिशील समाज के निर्माण में अपना योगदान दें।
और अंत में
मंत्रीजी अपना सामाजिक जिम्मेदारी समझे और उनका निर्वाह करें।ऐसे भी महिलाएं छोटी-छोटी बात नही भूलती है और अगर इनकी मन की बात पूरी नही होगी तो समझो हिसाब बराबर अगले चुनाव में..!

Sunday, 16 April 2017

धर्मप्रेमिका

अंजाम की खबर तो मीरा को भी थी...!

मगर बात सिर्फ मोहब्बत निभाने की थी...!

Sunday, 9 April 2017

धर्मप्रेमिका !

जब तू दाँतो मे क्लिप दबा कर, खुले बाल बांधती है न…!

कसम से एक बार तो जिंदगी, वही पर रुक जाती हैं..!

सच कह रहा हूँ पगली..
.


धर्मप्रेमिका !

ज़हर का स्वाद शिव शंकर भोलेनाथ से पूछो,

अगर मीरा से पूछोगे तो अमृत ही कहेगी...!!


Monday, 3 April 2017

हमे और जीने की चाहत ना होती अगर तुम ना होते, अगर तुम ना होते


हमे और जीने की चाहत ना होती
अगर तुम ना होते, अगर तुम ना होते

तुम्हे देख के तो लगता हैं ऐसे
बहारों का मौसम आया हो जैसे
दिखायी ना देती, अंधेरों में ज्योती
अगर तुम ना होते..

हमे जो तुम्हारा सहारा ना मिलता
भंवर में ही रहते, किनारा ना मिलता
किनारे पे भी तो, लहर आ डूबोती
अगर तुम ना होते..

न जाने क्यो दिल से, ये आवाज़ आयी
मिलन से हैं बढ़ के, तुम्हारी जुदाई
इन आँखों के आँसू ना कहलाते मोती
अगर तुम ना होते..

गीतकार : गुलशन बावरा,
गायक : किशोर कुमार,
संगीतकार : राहुलदेव बर्मन,
चित्रपट : अगर तुम ना होते - 1983

Saturday, 11 March 2017

इरोमी शर्मिला आयरन लेडी !

ग़ालिब!
मैं जिस दुनियां में रहता हूँ न,
यहां भोले और सीधे लोग बहुत दिखतें हैं
मैं तो अब तेरे दर का अपराधी हो गया क्योंकि?
मेरे पास खून से सना शाकाहारी खंजर नही।
#इरोम_शर्मिला नाम तो जानतें ही होगें जिसे पूरी दुनियाँ #आयरन_लेडी के नाम से जानती है उसे मात्र 90 लोग ही उसके विधानसभा क्षेत्र में जनता है इसे ही कहते हैं राजनीति।
जो अपने जीवन के एक हिस्सा सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (एएफएसपीए- अफस्पा) के खिलाफ 16 वर्ष तक भूख हड़ताल पर रहीं थी।यह वही अफस्पा कानून है जिसका जिक्र #फ़िल्म_हैदर में शाहिद कपूर ने चुस्पा शब्द से किया था। इस लंबे संघर्ष के बाद उन्होंने अगस्त 2016 में अपनी भूख हड़ताल खत्म की थी। अक्टूबर, 2016 में उन्होंने पीपल्स रीसर्जेंस एंड जस्टिस एलांयस (पीआरजेए) का गठन किया और इस मार्च में होने वाले विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया था। परिणाम आपको पता ही क्या हुआ है...
दोस्त हार-जीत की बात नही है यह जो 90 वोट ! अभी तक गले से नीचे नही उतर रहा है और ना ही दिमाग़ मानता है ना ही समझ पा रहा है।
और अंत में
इरोम शर्मिला मानवता के हक़ की लड़ाई में आपकी हमेशा जीत होगी और यह समाज आपका हमेशा ऋणी रहेगा।


Sunday, 22 January 2017

हरामख़ोर..

हरामख़ोरी एक कला है। जिस में व्यक्ति हरामख़ोर से हरामख़ोरी तक के सफ़र में निपुणता हासिल करता है और बाद में अपने कारनामों के अनुभव और उम्र का तकाज़ा का प्रयोग करता है।
हरामख़ोर नामक प्राणी हमारे समाज में हमारे आसपास ही रहता है।वह कभी शिक्षक, पड़ोसी, दोस्त, प्रियतम, मकान मालिक, किरायदार या संबन्धी के रूप में होता है।
भोली भाली मुरतरूपि सूरत को अपनी बातों में फसा कर उसका शारीरिक और मानसिक शोषण करता है। महज़ 8वीं और 9वीं कक्षा में पढ़नें वालो या इस उम्र के बच्चों से अगर नाम पूछा जाए तो वह बतानें के क्रम में दस बार सोचता है फिर भी हकलानें लगता है......उस पर यह हरामख़ोर अपनी नामर्दगी साबित करता है।
एक मिनट के लिए जरा सोचें यह शोषित व्यक्ति अगर हमारे घर का निकला तब क्या होगा...उसपर कितनें और किस प्रकार के प्रहार हुआ होगा.....सोच कर दिमाग़ में कंपन होनें लगता है।
इस लिए जहाँ भी यह हरामख़ोर मिले हमारा कर्तव्य और दायित्व बनता है की इस मानसिकता वालों का पुरे जोर से कठोर विरोध करें, अपनें परिवार और समाज की मासूम जिंदगी की रक्षा करें...
और अंत में...
गोरा-चिट्टा, भोली सूरत, शांत स्वभाव पर न जाए। यह कितनों-कितनों को चुपचाप का दिखावा कर अपनें जंजाल में फसाता है।

क़यामत की रात...संपर्क क्रांति एक्सप्रेस

अभी संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में हूँ । ऊपर वाला सीट है, ठण्ड बहुत लग रही है अपना पृष्ठीय क्षेत्रफल कम कर दिया हूँ..फिर भी कोई असर नही दिख रहा है..ओहो मैं आपको बताना भूल गया की मेरे सीट के ऊपर दो दो पंखा चल रहा है...
सामनें वाले सीट पर एक मोहतरमा हैं जो दोनों पंखे पर मालिकाना हक जमा रखी है....मैं अपना दुखभरी राग में भी दर्द सुनाता हूँ तो वो नही मानती है, बोलती तो ऐसी है जैसे सलमान खान की बहन हो " मैनें एक बार कमिटमेंट कर दी हूँ उसके बाद पंखा बंद नही होगा..."इतनें ठण्ड में आइसक्रीम भी खरीद कर खा रही है...
जो मुझे अच्छी तरह से जनता उसे पता है कि गर्मी के मौसम में भी मेरा और पंखा का कैसा रिश्ता रहता है...
और अंत में ...
हाँथ बर्फ हो गया है लिख नही पा रहा हूँ । पता नही यह क़यामत की रात  किस तरह गुजारूं..😥😥😥